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विज्ञान

एड्स पर 2030 तक नियंत्रण संभव

संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि एचआईवी के नए संक्रमण और एड्स से होने वाली मौतों में कमी आई है. इससे यह संभव दिख रहा है कि इस महामारी पर 2030 तक नियंत्रण पाया जा सकता है लेकिन इससे पीड़ित लोगों की संख्या अभी भी अधिक है.

ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में अगले हफ्ते होने वाले एड्स कॉन्फ्रेंस के पहले संयुक्त राष्ट्र संस्था यूएन एड्स ने अपनी वैश्विक रिपोर्ट में कहा, "पहले से कहीं ज्यादा उम्मीद है कि एड्स को खत्म किया जा सकता है. हालांकि कामकाजी दृष्टिकोण या एड्स विरोधी गतिविधियों की वर्तमान गति से महामारी को खत्म नहीं किया जा सकता है."

रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर में एचआईवी संक्रमित मरीजों के साथ संख्या 3.5 करोड़ पर स्थिर है. 1980 के दशक में शुरू होने के बाद से इस महामारी ने अपनी चपेट में आए 7.8 करोड़ों लोगों में से 3.9 करोड़ लोगों की जान ली है. यूएन एड्स के प्रमुख मिषेल सिडिबे ने रिपोर्ट में कहा, "एड्स महामारी को हर क्षेत्र, हर देश, हर स्थान, हर आबादी और हर समुदाय से समाप्त किया जा सकता है. उम्मीद की ढेर सारी वजहें और लक्ष्य के प्रति दृढ़ निश्चय है."

ह्यूमन इम्यूनो डेफिशिएंसी वायरस यानी एचआईवी एड्स फैलाने वाला वायरस है. एड्स खून, मां के दूध और सेक्स के दौरान वीर्य से संक्रमित होता है, लेकिन एंटी रिट्रोवायरल ट्रीटमेंट की मदद से इसे नियंत्रित किया जा सकता है. यूएन एड्स का कहना है कि 2013 के अंत तक करीब 1.29 करोड़ एचआईवी पॉजिटिव लोगों को एंटी रिट्रोवायरल ट्रीटमेंट मिली. आंकड़ों में नाटकीय सुधार आया है क्योंकि एड्स के इलाज की दवा इससे पहले वाले साल में सिर्फ एक करोड़ लोगों को ही मिल पाई थी. साल 2010 में सिर्फ 50 लाख लोगों को दवा मिल पा रही थी.

रिपोर्ट कहती है कि 2001 से अब तक नए एचआईवी संक्रमण के मामले में 38 फीसदी की गिरावट आई है. एड्स से होने वाली मौत में 35 फीसदी की गिरावट आई है. 2005 में इससे होने वाली मौत का आंकड़ा उच्चतम स्तर पर था. रिपोर्ट के मुताबिक, "दुनिया एड्स के परिदृश्य में असाधारण बदलाव की गवाह बनी है. पिछले 23 सालों की तुलना में इन पांच सालों में अधिक उपलब्धियां हासिल की गईं हैं."

यूएन की रिपोर्ट कहती है कि 2030 तक एड्स महामारी के खात्मे का मतलब होगा कि एड्स के फैलाव पर काबू पाया जा सकेगा या उसे निहित किया जा सकेगा. समाज पर वायरस का प्रभाव और लोगों की जिंदगी में खराब सेहत, कलंक, मृत्यु और एड्स के कारण होने वाले अनाथों की संख्या में महत्वपूर्ण गिरावट दर्ज होगी. जैसे जैसे इसका प्रभाव कम होगा जीवन दर में वृद्धि, लोगों की विविधता और अधिकारों की स्वीकृति, उत्पादन क्षमता में वृद्धि और खर्च में कमी होगी."

एए/एमजे (रॉयटर्स)

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