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विज्ञान

एड्स के मरीज गांव से बाहर

थाईलैंड के एक गांव के लोगों ने एकजुट होकर वहां एचआईवी के मरीजों को पनाह देने वाली एक गैर सरकारी संस्था को गांव से बाहर निकालने का फैसला किया. इस चैरिटी में 48 एचआईवी प्रभावित लोग रह रहे थे.

गांव में एचआईवी ग्रसित मरीजों के लिए काम करने वाली गैर सरकारी संस्था 'द ग्लोरी हट फाउंडेशन' के अधिकारियों बताया कि गांव वालों को लगता है कि मरीजों के रहने से उनके कारोबार पर असर पड़ रहा है. संस्था की प्रवक्ता चंचनोक खामतोंग के मुताबिक, "वे हमसे गांव छोड़कर जाने के लिए कह रहे हैं, जबकि हम अपने इस्तेमाल से बची हुई बहुत सारी सामग्री उन्हें दान कर देते हैं और उनके बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाते हैं." गांव वालों के मुताबिक गांव में एचआईवी मरीजों के रहते उनकी जमीनों की कीमत घट रही है. वे चाहते हैं कि मरीजों को अपने यहां रखने वाली यह संस्था उनके गांव से कहीं और चली जाए.

खामतोंग के मुताबिक संस्था के पास पैसों की किल्लत है, कहीं और किराए पर जगह लेना संभव नहीं है. उन्होंने कहा "हमारे पास इस समय कहीं और जाने के लिए पैसे नहीं हैं. हम गांव वालों को तंग नहीं कर रहे हैं, हम सिर्फ मरीजों की मदद करना चाहते हैं." चोनबुरी प्रांत की नगर पालिका ने कहा है कि वे संस्था के लिए कोई और बेहतर जगह तलाश करेंगे.

लंबे जीवन की संभावना

अब तक एड्स को ऐसी लाइलाज बीमारी माना जाता रहा है जिससे कुछ सालों में जीवन का अंत हो जाता है. लेकिन रिसर्चरों की मानें तो आधुनिक दवाओं की मदद से एचआईवी संक्रमित मरीज भी लगभग सामान्य लोगों जितना लंबा जीवन जी रहे हैं. एचआईवी के खिलाफ एंटी रेट्रोवायरल ट्रीटमेंट एआरटी की मदद से मृत्यु दर में काफी कमी आई है. एआरटी का विकास नब्बे के दशक में हुआ. यह इलाज मरीज में ह्यूमन इम्यूनो डेफीशिएंसी वायरस यानि एचआईवी को मारता नहीं है, बल्कि वायरस के पनपने की गति को धीमा कर एड्स के फैलाव को रोकता है. एआरटी के इलाज से पहले मरीज इतने लंबे समय तक जीवित नहीं रह पाते थे. एड्स प्रभावित लोगों के शरीर में रोग प्रतिरोधी क्षमता के नष्ट हो जाने के कारण कैंसर या कोई अन्य बीमारी आसानी से उन्हें अपनी चपेट में ले लेती है.

एसएफ (वार्ता)/ आरआर

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