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मंथन

एड्स के इलाज की कोशिश

30 साल पहले वैज्ञानिकों को पता चला कि एड्स बीमारी के पीछे ह्यूमन इम्यूनोडेफिशिएंसी वायरस का हाथ है. विश्व भर में ढाई करोड़ लोग इस बीमारी का शिकार बन गए हैं. अफ्रीका, एशिया और पूर्वी यूरोप में यह बीमारी अब भी फैल रही है.

ह्यूमन इम्यूनोडेफिशियेंसी वायरस यानी एचआईवी सीथे शरीर की रोग प्रतिरोधक कोशिकाओं पर वार करता हैं. यह वायरस अपने जीन्स को मानव कोशिकाओं में ढाल सकता हैं जहां वह लंबे वक्त तक असक्रिय रह सकते हैं. जब यह वायरस सक्रिय होकर और वायरस पैदा करता है तो रोग प्रतिरोधी कोशिकाएं अपना काम सही तरीके से नहीं कर पातीं.

शरीर का इम्यूनिटी सिस्टम कमजोर हो जाता है. एड्स का अब तक कोई इलाज नहीं, लेकिन सही समय पर बीमारी के पता चलने से मरीज को बचाया जा सकता है.

मुहिम

इन्फेकशन होते ही अगर एचआईवी का पता लगाना बहुत जरूरी है. जितनी जल्दी इलाज शुरू हो, उतनी देर तक वायरस को काबू में रखा जा सकता है. इस बीच दिन में केवल एक टैबलेट काफी है. बर्लिन में डॉक्टर केकावुस आरस्ते एड्स के खिलाफ मुहिम चला रहे हैं. वह बताते हैं, "हम एड्स को खत्म करने के लिए तेज तरीके खोज रहे हैं, मतलब हम एक टीका विकसित कर रहे हैं लेकिन इसका असर बिलकुल नहीं हुआ. लेकिन दवाओं के जरिये हम वायरस को काबू करने में समर्थ रहे हैं. अगर इलाज सफल होता है तो जिन लोगों की रोग प्रतिरोधी क्षमता अब भी बची हुई है, वह एक सामान्य जीवन जी सकते हैं."

इससे काफी फर्क पड़ता है. एड्स के कीटाणु का तो पता लगा दिया गया है लेकिन शोधकर्ता इसके खतरे को पूरी तरह खत्म करना चाहते हैं. हालांकि एचाईवी के खिलाफ टीका बनाना मुश्किल है, क्योंकि यह कीटाणु अपने आप को लगातार बदलता रहता है. "मैं नहीं मानता कि मैं अपने पेशेवर जीवन में यह चमत्कार देख पाऊंगा. एचाईवी वायरस बहुत ही चलाक है."

HIV Patient John-Manuel Andriote

एचआईवी से संक्रमित जॉन मैन्युएल एंड्रॉइट

लेकिन डॉक्टरों की खोज जारी है. अमेरिका में वैज्ञानिकों की एक टीम ने एक ऐसी रोग प्रतिरोधक कोशिका यानी एंटीबॉडी का पता लगाया है जो एचआईवी के बदलने के साथ साथ बदलती है और सारे कीटाणुओं को खत्म करती है.

जीन्स पर नजर

वैज्ञानिक कोशिश कर रहे हैं कि वायरस से बचाने वाले जीन्स को मरीजों के शरीरों में डाला जाए जिससे एचआईवी खत्म हो. लेकिन इन परीक्षणों के नतीजों में कुछ साल लगेंगे. केकावुस अरस्तेह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि लोग वायरस के साथ और दवाओं के बिना कैसे अच्छी तरह से जी सकते हैं. इसके जवाब जानवरों में भी खोजे जा रहे हैं. "बंदर एचआईवी कीटाणुओं के साथ कैसे रहते हैं. उनके शरीर में कितने वायरस होते हैं. उनका इम्यून सिस्टम आराम से रहता है और वह वायरस के साथ जिंदा रह लेते हैं." और यह बंदर बीमार भी नहीं पड़ते. ऐसा कैसे होता है. इसके पीछे क्या है. रिसर्चर यह जानने की कोशिश कर रहे हैं ताकि भविष्य में एड्स को फैलने का मौका ही न मिले.

रिपोर्टः ईशा भाटिया

संपादनः आभा मोंढे

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