1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

दुनिया

एक साल में विस्थापित हुए रिकॉर्ड 6.5 करोड़ लोग

यूएन रिफ्यूजी एजेंसी के अनुसार अपने देशों में उत्पीड़न और हिंसक संघर्ष से भाग कर केवल एक साल में ही करीब 6.53 करोड़ विस्थापित हुए हैं. साल 2015 के यह आंकड़े विस्थापितों का नया रिकॉर्ड हैं.

सीरिया और अफगानिस्तान के संकटपूर्ण हालात ने 2015 में रिफ्यूजी और आंतरिक विस्थापन के शिकार हुए लोगों की तादाद में रिकॉर्ड इजाफा किया है. एक साल पहले 2014 में 6 करोड़ विस्थापितों के साथ दूसरे विश्व युद्ध के बाद सबसे अधिक लोग प्रभावित हुए थे. साल 2015 के आखिर तक दर्ज हुए आंकड़े उसके भी पार पहुंच गए. यूएनएचसीआर ने अपनी ग्लोबल ट्रेंड्स रिपोर्ट में बताया है कि 2015 में कुल 6.53 करोड़ लोग विस्थापित हुए.

यूएन एजेंसी ने बताया कि पिछले साल हर मिनट औसतन 24 लोग विस्थापित हुए यानि हर दिन करीब 34,000 लोग. ठीक दस साल पहले 2005 में यह आंकड़ा हर मिनट केवल 6 लोगों का था. 2011 में सीरिया युद्ध शुरु होने के समय से ही वैश्विक विस्थापन में 50 फीसदी बढ़ोत्तरी दर्ज हुई है. आधे से ज्यादा रिफ्यूजी केवल तीन देशों सीरिया, अफगानिस्तान और सोमालिया के हैं.

रिपोर्ट की एक और बेहद चिंताजनक बात यह रही कि 2015 के कुल विस्थापितों में आधे से अधिक बच्चे थे. इनमें से कई अपने अभिभावकों से बिछड़ चुके थे. ऐसे 98,400 अकेले बच्चों का शरण लेने के लिए अनुरोध दर्ज हुआ है.

जेनेवा स्थित यूएन संस्था ने यूरोप समेत विश्व भर के नेताओं से दुनिया के कई इलाकों में जारी युद्ध रोकने की कोशिश करने को कहा है. यूएन हाई कमिश्नर फॉर रिफ्यूजी फिलिपो ग्रांडी ने कहा, "मुझे आशा है कि जबरन विस्थापन से प्रभावित लोगों का संदेश नेताओं तक पहुंचे. हमें तुरंत कार्रवाई चाहिए, संघर्षों को रोकने के लिए फौरी राजनीतिक कार्रवाई." ग्रांडी ने साफ किया कि विस्थापित अपने साथ जो संदेश लेकर आ रहे हैं वो यह है कि "अगर आप समस्याएं नहीं सुलझाते, तो समस्याएं आप तक पहुंच जाएंगी."

25 लाख लोगों के साथ लगातार दूसरे साल तुर्की में सबसे अधिक रिफ्यूजियों को शरण मिली. इसके बाद पाकिस्तान और लेबनान दूसरे और तीसरे नंबर पर रहे. 4.08 करोड़ लोग अपने ही देश में आंतरिक विस्थापन के शिकार हुए. पिछले एक साल में केवल यूरोप में ही 10 लाख लोग पहुंचे, जिससे ईयू में राजनीतिक संकट की स्थिति पैदा हो गई. कई यूरोपीय देशों ने अपनी सीमा पर बाड़ें लगवा दीं और बाहर से आए लोगों की अबाध आवाजाही पर नियंत्रण करने की कोशिशें कीं. यूएन एजेंसी के प्रमुख ग्रांडी का कहना है कि ऐसी यूरोपीय नीतियों से दुनिया भर में एक गलत उदाहरण पेश हो रहा है.

DW.COM

संबंधित सामग्री