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दुनिया

एक लाख टीचरों की कमी

जर्मनी के कुछ विश्वविद्यालय विश्व में सबसे अच्छे माने जाते हैं, लेकिन अगर प्रारंभिक शिक्षा की बात करें तो मामला गड़बड़ है. स्कूलों को टीचरों की कमी का नुकसान उठाना पड़ रहा है.

नए शोध के मुताबिक जर्मनी के किंडरगार्टनों के लिए करीब 1,20,000 और टीचरों की जरूरत है. इन्हें काम पर रखने के लिए और पांच अरब यूरो की तो जरूरत पड़ेगी ही लेकिन किटा यानि केजी स्कूलों में होने वाला खर्च भी एक तिहाई बढ़ जाएगा.

शुक्रवार को प्रकाशित बैर्टेल्समन प्रतिष्ठान के शोध में पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी में बड़ा अंतर पाया गया. इसलिए प्रतिष्ठान के प्रमुख यॉर्ग ड्रैगर की अपील है कि पूरी जर्मनी के लिए किंडरगार्टन में एक जैसे सिस्टम और नियम लगाए जाएं.

शोध में पाया गया कि पूर्वी जर्मनी के केजी में हर टीचर को औसतन 6.3 बच्चों का ध्यान रखना पड़ता है जबकि पश्चिमी जर्मनी में ये आंकड़ा सिर्फ 3.8 है. ब्रेमेन और बाडेन व्युर्टेम्बर्ग में हर तीन बच्चों के लिए एक टीचर होता है. पूर्वी सैक्सनी अनहाल्ट में एक शिक्षक छह से ज्यादा बच्चों का ध्यान रखता है.

भारत के किंडरगार्टन की एक क्लास में अक्सर 30 या उससे कहीं ज्यादा बच्चे भी हो सकते हैं, लेकिन जर्मनी में अनुपात बहुत ही कम है.

तीन साल से ज्यादा के बच्चों में भी टीचरों की संख्या में अंतर है. पश्चिम में जहां औसतन 9.1 बच्चों पर एक टीचर होता है वहीं पूर्वी शहरों में एक टीचर की देखरेख में औसतन 12.7 बच्चे होते हैं. वहीं मेक्लेनबुर्ग पोमेरेनिया में एक टीचर के पास करीब 15 बच्चे होते हैं.

इतना ही नहीं शोध में यह भी सामने आया है कि टीचर हमेशा बच्चों पर ध्यान नहीं दे पाते क्योंकि उनका समय टीम मीटिंग, एडवांस ट्रेनिंग और छुट्टियों में जाता है.

अगर आदर्श स्थिति और बेस्ट टीचिंग की बात की जाए तो प्रतिष्ठान के मुताबिक तीन साल से छोटे बच्चों के लिए प्रति शिक्षक सिर्फ तीन ही बच्चे होने चाहिए. जबकि तीन साल से ऊपर के बच्चों के लिए प्रति टीचर संख्या 7.5 हो सकती है. ड्रैगर की सलाह है कि पूरी जर्मनी में नीति और प्रैक्टिस के मानक एक जैसे हों ताकि सभी जगह एक जैसी शिक्षा बच्चों को मिल सके.

एएम/एमजी (डीपीए)

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