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दुनिया

एक बस के सफर से अखिलेश की बगावत का टेस्ट

समाजवादी पार्टी की बुधवार से शुरू हो रही रथ यात्रा में चुनाव के साथ-साथ मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की साख की भी परीक्षा होनी है.

पारिवारिक झंझावात से झूझ रही समाजवादी पार्टी को इस समय अपनी प्रतिष्ठा को वापस पाना है. इस रथ यात्रा के माध्यम से एक बात तय है कि सपा को यह समझ आ चुका है कि अगले विधानसभा चुनाव उसके लिए काफी मुश्किल हो गए हैं और अब उसके पास सिर्फ यह रास्ता बचा है कि अखिलेश को पार्टी से बड़ा कर दिया जाए. पार्टी की कोशिश है कि माहौल कुछ ऐसा हो जाए जैसे बीजेपी के लिए 2014 के लोकसभा चुनाव में था जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का कद ऐसा हो गया कि कैंडिडेट्स उनके नाम पर जीते. सपा के लिए भी यही समय की मांग है और अखिलेश इसी समझ से आगे बढ़ रहे हैं. सितम्बर 12-13 की घटना के बाद अखिलेश को अब एक बार फिर अपने को साबित करना है. इस चुनाव में कोई भी परिणाम केवल उनके सर जाएगा.

सपा में सब कुछ सामान्य नहीं है. जहां अखिलेश समर्थक रथ यात्रा की तैयारी में जुटे हैं वही शिवपाल समर्थक 5 नवम्बर के रजत जयंती समारोह में की तैयारियां कर रहे हैं. दोनों का एक लक्ष्य है. भीड़ ज्यादा से ज्यादा हो. अपने साथ ही बर्खास्त किए गए दो मंत्रियों ओम प्रकाश सिंह और नारद राय के साथ मुलायम सिंह यादव के भाई शिवपाल खुद समारोह स्थल पर पहुंचे. दावा है कि समारोह में कई अन्य दलों के नेता जैसे देवेगौड़ा, शरद यादव और लालू यादव भी आएंगे. वहीं सपा से निष्कासित सांसद रामगोपाल के मौजूद रहने की भी उम्मीद है. दिलचस्प यह है कि अखिलेश और शिवपाल दोनों ही एक-दूसरे के कार्यक्रम में जाने की बात कह रहे हैं.

सन 2011 में भी अखिलेश ने रथ यात्रा निकली थी. उस समय उसका नाम क्रांति रथ दिया गया था. सपा 2012 का चुनाव बहुमत से जीत गई लेकिन श्रेय सभी ने बांट लिया. उस समय अखिलेश के रथ को मुलायम सिंह ने झंडी दिखाई थी और शिवपाल ने यात्रा के लिए पैसे की थैली भेंट की थी.

अब जब परिवार के झगडे सड़क पर आ चुके हैं और सपा अखिलेश-शिवपाल के खेमे में बंटी दिख रही है तो इस यात्रा का पूरा जिम्मा अखिलेश पर है. अगर अखिलेश को लोगों का समर्थन मिलता है और सपा के कार्यकर्ता भी उनके साथ जुड़ जाते हैं तो वह अपने नेतृत्व और अपनी सरकार के कार्यो पर मुहर लगवा लेंगे. इसीलिए शायद यात्रा का नाम 'विकास से विजय की ओर' दिया गया हैं. अखिलेश को यह भी साबित करना होगा कि हर जिले में पार्टी नेता उनके साथ हैं. उन्हें यह भी साबित करना है कि पार्टी का कोर वोट बैंक यानी मुस्लिम-यादव और राज्य के युवा उनके साथ हैं. साथ ही मुख्यमंत्री अपने पक्ष में इस्तीफा देने या पार्टी से निष्कासन झेलने वाले लोगों को भी संदेश देना चाहेंगे कि भविष्य उन्हीं का है.

तस्वीरों में देखिए: विरासत की नेतागीरी

इस बार खींचतान को देखते हुए अखिलेश ने 19 अक्टूबर को मुलायम को चिठ्ठी लिख कर बता दिया कि वह रथ यात्रा पर 3 नवम्बर से निकल रहे हैं. अभी तक सपा ने अधिकारिक रूप से इस रथ यात्रा पर कुछ नहीं कहा. यहां तक कि पूरा लखनऊ पोस्टर बैनर से पाट दिया गया है लेकिन उसमे ज्यादातर में निवेदकों के रूप में जनेश्वर मिश्र, 'लोहिया के लोग' संस्थान ट्रस्ट का नाम अंकित है. इस ट्रस्ट के अध्यक्ष अखिलेश यादव ही हैं. इसे विक्रमादित्य मार्ग पर एक बंगला आवंटित कर दिया गया है. कहने को सपा कार्यालय का पिछला गेट ट्रस्ट के सामने खुलता है लेकिन एक ताले की वजह से वह बंद है और दूरियां बरकरार हैं. ट्रस्ट में जमावड़ा अखिलेश समर्थकों का है जो सपा से निष्कासित है या अपने पद से इस्तीफा दे चुके हैं. वरिष्ठ मंत्री राजेंद्र चौधरी और मुलायम के पुराने सहयोगी एस आर एस यादव भी मोर्चा संभाले हुए हैं. यात्रा का प्रोग्राम ट्रस्ट द्वारा जारी हो रहा है. दस टायर वाली बस जिसको रथ बनाया गया है उस पर सिर्फ अखिलेश और मुलायम की तस्वीर है, शिवपाल नदारद हैं.

रथ यात्रा की भीड़ का जिम्मा अखिलेश के निकटतम सहयोगी सुनील सिंह साजन पर है जो पार्टी के निष्कासित एमएलसी हैं. उनका दावा है कि यात्रा की शुरुआत के वक्त लामार्ट ग्राउंड पर एक लाख लोग जुटेंगे जबकि शुक्लागंज, उन्नाव में यात्रा के समापन के वक्त 50 हजार लोग मुख्यमंत्री का इंतजार कर रहे होंगे. भीड़ का महत्व समझते हुए अखिलेश ने यात्रा लखनऊ से उन्नाव तक रखी है क्योंकि उन्नाव साजन का गृह जनपद है. साजन इससे पहले अखिलेश का लोकसभा चुनाव के दौरान बनारस में बड़ा रोड शो को मैनेज कर चुके हैं. ट्रस्ट के अध्यक्ष राजेंद्र चौधरी के अनुसार मुलायम सिंह यात्रा को झंडी दिखाएंगे. लामार्ट ग्राउंड पर साढ़े चार साल पहले अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी और अब यहीं से अपनी राजनीतिक जीवन की अहम् यात्रा शुरू कर रहे हैं.

 

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