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ब्लॉग

एएमयू की मर्जी पर भारी पड़ा कानून

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को महीने भर से चल रही जद्दोजेहद में कानून के आगे आखिरकार घुटने टेकने ही पड़े. एएमयू को एक पुस्तकालय में छात्राओं के जाने से रोकने का आदेश वापस लेना पड़ा.

इस पुरातनपंथी आदेश को बरकरार रखने के लिए एएमयू ने छात्राओं की मर्जी का भी हवाला दिया मगर संविधान के आगे उसकी एक न चली. इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि एएमयू का यह पुस्तकालय भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना आजाद के नाम पर है, जो ताउम्र महिलाओं को भी पुरुषों के समान शिक्षा का अधिकार मयस्सर कराने की वकालत करते रहे. पुस्तकालय में छात्राओं के प्रतिबंध की बात मीडिया में आने पर पहले तो कुलपति ले. जनरल जमीरुद्दीन शाह ने फौजी रुख अख्तियार किया मगर कानून के आगे उन्हें झुकना पड़ा.

इतना ही नहीं अपने फैसले पर कायम रहने के लिए उन्होंने बड़ी ही रोचक दलीलों को अपनी ढाल बनाने की कोशिश की. मगर इलाहाबाद हाइकोर्ट में मूल अधिकारों के कवच ने उनकी इस ढाल को नाकाम साबित कर दिया. चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड और जस्टिस प्रदीप सिंह बघेल की खंडपीठ के समक्ष महज कुछ घंटों की बहस के दौरान एएमयू प्रशासन की दलीलें पूरी तरह से नाकाम साबित हुईं. आखिरकार कुलपति जनरल शाह को अदालत में हलफनामा देकर छात्राओं के लिए भी पुस्तकालय के दरवाजे खोलने का वादा करना पड़ा.

इससे पहले एएमयू की ओर से पेश दलीलों पर भी गौर फरमाना जरुरी है. जनरल शाह की ओर से ब्रह्मास्त्र के तौर पर इस फैसले के पीछे छात्राओं की सहमति का हवाला दिया गया. अदालत ने इस पर चैंकते हुए एएमयू से इसका कारण पूछा तो बताया गया कि पुस्तकालय विश्वविद्यालय परिसर से काफी दूर मौजूद है और यहां तक आने जाने में सुरक्षा का संकट होने के कारण छात्राएं खुद को महफूज नहीं मानती हैं. इसे साबित करने के लिए अदालत के सामने कुछ छात्राओं के बयान तक पेश किए गए. और तो और पुस्तकालय का क्षेत्रफल कम होने के आधार पर यह दलील भी दी गई कि छात्र और छात्राओं को एक साथ पुस्तकालय में जाने की अनुमति देने से भीड़ बढ़ जाएगी जिससे हालात बेकाबू हो सकते हैं.

मगर सिर्फ एक दलील और एक आश्वासन के सामने एएमयू की दकियानूसी दलीलों का किला भरभराकर ढह गया. सबसे पहले वादी पक्षकार ने संविधान में प्रदत्त मूल अधिकरों का हवाला देकर इसे छात्राओं की मर्जी से जोड़ने की बात को गलत बताया. जबकि सुरक्षा के मसले पर अदालत ने स्थानीय पुलिस से वस्तुस्थिति की रिपोर्ट तलब की. इसके जवाब में पुलिस ने अदालत को बताया कि अब तक एएमयू की ओर से इस तरह के सुरक्षा संकट के बारे में पुलिस को न तो अवगत कराया गया है और ना ही पुस्तकालय आने जाने वाले रास्ते पर किसी तरह की वारदात का कोई रिकॉर्ड है. साथ ही पुलिस अधीक्षक ने छात्र छात्राओं को सुरक्षा देने का भी आश्वासन दिया.

अदालत ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में कानून की तीन छात्राओं द्वारा दायर इस जनहित याचिका पर फैसला सुनाते हुए कहा कि एएमयू इनमें से किसी भी बहाने के बलबूते छात्राओं के साथ भेदभाव नहीं कर सकता. संविधान के अनुच्छेद 16 में दिए गए मूल अधिकार किसी भी कानून की आड़ में नहीं छीने जा सकते हैं. खासकर आज के इस युग में मध्यकालीन दलीलों के आधार पर नई पीढ़ी को भेदभाव का शिकार बनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती है. कम से कम एएमयू को वक्त की नजाकत समझते हुए अपने नजरिए की समीक्षा करने के लिए यह फैसला आइना दिखाने वाला कहा जा सकता है.

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