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दुनिया

ऊर्जा आयात से आजाद अमेरिका

अमेरिका का सपना पूरा होने वाला है. एक रिसर्च से पता चला है कि 2030 तक अमेरिका ऊर्जा के आयात से मुक्त हो जाएगा. इस भविष्यवाणी ने ऊर्जा क्षेत्र में हड़कंप मचा दी है और एक नई बहस छिड़ गई है.

तेल संकट के बीच नवंबर 1973 में राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने अमेरिकी लोगों को "प्रोजेक्ट इंडिपेंडेंस" की पहल से जोड़ा था. इस भाषण के बाद से ही ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर होना अमेरिका के राष्ट्रपति पद पर बैठे सभी नेताओं का राजनीतिक लक्ष्य रहा है. अमेरिका को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की निक्सन की सोच और सारी कोशिशें 1980 तक नाकाम हो गईं पर अब 40 साल के बाद यह सपना शायद हकीकत में बदल जाएगा.

पेरिस की अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने पिछले साल भविष्यवाणी की कि दुनिया भर के ऊर्जा कारोबार में अमेरिका सबसे आगे आ जाएगा. आईईए की भविष्यवाणी के मुताबिक अमेरिका 2015 तक सबसे बड़े गैस उत्पादक के रूप में रूस की जगह ले लेगा और 2017 में सबसे बड़े तेल उत्पादक का ताज सऊदी अरब की बजाए उत्तर अमेरिका के माथे पर होगा. आईईए के मुताबिक 2020 तक अमेरिका गैस निर्यातक बन जाएगा और व्यवहारिक रूप में 2035 तक ऊर्जा के क्षेत्र में वह पूरी तरह से आत्मनिर्भर होगा जहां उसे किसी तरह के ऊर्जा आयात की जरूरत नहीं होगी.

ऊर्जा स्वतंत्रता दिवस

अमेरिकी बैंक सिटीग्रुप और अमेरिकी सरकार की नेशनल इंटेलिजेंस काउंसिल ने भी इसी तरह की भविष्यवाणी की है. सिटीबैंक के विश्लेषकों का अनुमान है कि ऊर्जा के आयात से अमेरिका की आजादी कुछ विशेष स्थिति में इस दशक के आखिर में भी शुरू हो सकती है. एनआईसी के मुताबिक अमेरिका 2020 तक ऊर्जा का एक बड़ा निर्यातक देश भी बन सकता है.

अमेरिका के ऊर्जा आयात में कमी कोई नई बात नहीं है. विवादित फ्रैकिंग जैसी उन्नत तकनीक के इस्तेमाल ने कई साल से अमेरिका में गैस और तेल का उत्पादन काफी ज्यादा बढ़ा दिया है. इसके साथ ही आर्थिक संकट के कारण तेल का इस्तेमाल घटा है. इसका नतीजा हुआ है कि 2005 से ही अमेरिका का तेल आयात लगातार घट रहा है. पिछले साल अमेरिका ने अपनी जरूरत का महज 40 फीसदी ही तेल आयात किया. 2005 में यह आंकड़ा 60 फीसदी था. 2019 तक इसकी मात्रा घटकर 34 फीसदी रहने की बात कही जा रही है. इसकी तुलना दूसरे देश से करें तो यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था जर्मनी व्यवहारिक रूप में पूरी तरह से ऊर्जा के आयात पर निर्भर है. आईईए के मुताबिक जर्मनी अपनी जरूरत का करीब 95 फीसदी तेल और 85 फीसदी गैस विदेशों से हासिल करता है.

विरोधी देशों से तेल नहीं

तेल के आयात पर घटती निर्भरता के भूराजनैतिक प्रभाव भी होंगे. सिटीबैंक के जानकारों का मानना है कि इससे तेल निर्यातक देशों के संगठन ओपेक का असर खत्म होगा. बैंक के शीर्ष विश्लेषक ने तो वॉल स्ट्रीट जर्नल में अमेरिका को नया मध्यपूर्व भी कह दिया है. ऊर्जा का खर्च घटने से आर्थिक उम्मीदें पूरी तो होंगी ही इसके साथ यह राजनीतिक उम्मीद भी है कि उन तेल निर्यातक देशों के साथ संबंध रखने की मजबूरी नहीं होगी जिन के साथ असहमति है.

राष्ट्रपति चुनाव के दौरान प्रचार में रिपब्लिकन उम्मीदवार मिट रोमनी ने कहा था, "हम मध्यपूर्व, वेनेजुएला या किसी ऐसी जगह से तेल नहीं खरींदेंगे जहां से हम नहीं खरीदना चाहते." आखिरकार अमेरिका को अब किसी इलाके या देश से राजनीतिक करार करते वक्त उसके ऊर्जा संसाधन के बारे में नहीं सोचना होगा. कुछ आलोचक अमेरिका की उर्जा आयात में घटती निर्भरता से तो सहमत हैं लेकिन वो इस तरह की भविष्यवाणियों और उनके असर पर सवाल उठा रहे हैं.

कमजोर आधार

वॉशिंगटन की सेंटर फॉर स्ट्रैटजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज में विदेश नीति के जानकार एंथनी कॉर्ड्समैन का कहना है, "शुरुआती आंकड़ों से सर्वश्रेष्ठ का उदाहरण ले कर बिना उसकी कीमत और पर्यावरण के बारे में सोचे अनुमान लगा लेना, इनका कोई मतलब नहीं है." भविष्यवाणियों के उलट अमेरिका सरकार की तरफ से कोई ऐसा आधिकारिक मॉडल नहीं है जो इन अनुमानों की पुष्टि कर सके. वास्तव में आईईए के सालाना आंकड़ों के मुताबिक तो 2040 में अमेरिका का तेल आयात थोड़ा सा बढ़ कर 37 फीसदी हो जाएगा. इसके अलावा आलोचना की एक वजह यह भी है कि इन रिसर्च में सारा ध्यान अमेरिका को तेल की सप्लाई पर है.

भूराजनीति के विशेषज्ञ जेफक्लोगन का कहना है, "अमेरिका मध्यपूर्व और दुनिया के तेल बाजार में बना रहेगा क्योंकि उसके यूरोपीय और एशियाई सहयोगी उस तेल पर निर्भर रहेंगे." अगर ऊर्जा की निर्भरता केवल सीधे आयात से जोड़ी जानी है तो इसमें इस सच्चाई की पूरी अनदेखी हो जाएगी कि अमेरिका एशिया और यूरोप से तैयार माल का एक बहुत बड़ा खरीदार है. ऐसे में जाहिर है कि इलाके में ऊर्जा की आपूर्ति में उसकी दिलचस्पी बनी रहेगी.

रिपोर्टः मिषाएल क्निगे/एनआर

संपादनः आभा मोंढे

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