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खेल

ऊंचे खिलाड़ियों में नाटी भारतीय टीम

भारतीय फुटबॉल क्यों अभी इतना पीछे है इसका जवाब ऊंचाई नापने का टेप निश्चित ही दे सकता है. फुटबॉल टीम के आलोचक कहते है कि लंबे अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों के सामने भारतीय फुटबॉल टीम बौनी है और यही हार का कारण है.

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विदेशी खिलाड़ियों के बीच बाइचुंग (बाएं)

फीफा की रैंकिंग में भारत की टीम 142वें नंबर पर है और फुटबॉल प्रेमी हर चार साल में यह सोचने को मजबूर हो जाते हैं कि भारतीय टीम वर्ल्ड कप में क्यों नहीं पहुंच पाती. हालांकि 27 साल बाद एशिया कप में भारतीय टीम ने क्वॉलिफाई कर लिया. भारत की फुटबॉल टीम की हार का कारण दिया जाता है कि खिलाड़ियों का कद कम है. पत्रकार और लेखक जयदीप बसु कहते हैं, "बहुत हद तक भारतीय फुटबॉल में ऊंचाई एक बड़ा मुद्दा है. देखिए फॉर्वर्ड में आपके पास 1.73 मीटर के बाइचुंग भूटिया हैं, उनके साथ सुनील छेत्री हैं दो 1.70 हैं. जब यह हवा में ऊंची बॉल के पीछे होंगे तो लंबे खिलाड़ियों के आगे यह टिक ही नहीं सकते."

Fußball in Indien

एनेक्डोटल हिस्ट्री ऑफ फुटबॉल नाम की पुस्तक लिखने वाले बसु आगे तर्क देते हैं, "डिफेंस में दीपक मोंडल हैं उनकी तकनीक खराब नहीं है. लेकिन सोचिए कि भारत इंग्लैंड के साथ खेले तो उनके सामने 2.01 मीटर के मार्क पीटर क्राउच होंगे."

बसु तर्क देते हैं, "इसलिए राष्ट्रीय टीम के कोच बॉब हॉटन लंबे खिलाड़ियों की तलाश में हैं. मुझे लगता है कि अभिषेक यादव का टीम में होना इसी का सबूत है. कम क्षमता वाले ऊंचे फॉरवर्ड खिलाड़ी. वहीं सुब्रतो पाल टीम इंडिया के बहादुर गोली रहे हैं लेकिन लंबे अरिंदम भट्टाचार्य बॉब की स्कीम के कारण लिए गए हैं."

खिलाड़ियों की सूची

2006 में जब हॉटन राष्ट्रीय प्रशिक्षक के तौर पर नियुक्त हुए तो उन्होंने 35 खिलाड़ियों की सूची दी लेकिन सबसे पहली बात जो उन्होंने देश के फुटबॉल फेडरेशन से कही वह यह कि लंबे खिलाड़ियों को ट्रायल के लिए बुलाया जाए. उनमें से बॉब ने मिकी फर्नान्डेज, फ्रेडी मैस्क्रेन्हस को वेंकूवर की चार टीमों वाले टूर्नामेंट के लिए चुना.

Sunil Chhetri

सुनील छेत्री

बसु बताते हैं कि 1962 के एशियन गेम्स के चैंपियन रहे भारत की फुटबॉल टीम में सात खिलाड़ी ऐसे थे जो छह फुट यानी 1.82 मीटर के आसपास या ज्यादा थे. बसु कहते हैं, "इनमें पीटर थांगाराज, अरुण घोष, चुनी गोस्वामी, जरनैल सिंह थे. यह हमारी सबसे अच्छी फुटबॉल टीम थी."

मानव भट्टाचार्य जो खेल विज्ञान अधिकारी हैं और राष्ट्रीय टीम के साथ काम करते हैं, उन्होंने भी एआईएफएफ को प्रस्ताव दिया है कि लंबे खिलाड़ियों को ट्रेनिंग देने के लिए एक केंद्र चलाया जाए लेकिन संघ ने इस बारे में तेजी नहीं दिखाई. रॉयटर्स समाचार एजेंसी से बातचीत के दौरान स्पोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया में काम कर रहे भट्टाचार्य का कहना है, "हमने मौका खो दिया. बैंगलोर में ऐसे ही सेंटर ने हमारी वॉलीबॉल टीम को बहुत मदद की. अब वह कम से कम विश्व कप के लिए क्वॉलीफाई तो कर सकी है. मैंने इसी तरह का प्रस्ताव भारतीय फुटबॉल के लिए रखा था. इससे हाल की टीम पर तो कोई असर नहीं पड़ता लेकिन आगे अच्छे खिलाड़ी लगातार मिलते रहते."

आर्सेलान सॉकर स्कूल के पॉल शिपराइट इस तर्क से सहमत नहीं हैं. हालांकि भारतीय फुटबॉल के धीमे विकास को देख कर वह भी हैरान हैं. "मुझे आश्चर्य होता है कि एक अरब की जनसंख्या वाला देश फीफा की रैंकिंग में 100 से बाहर है."

अच्छी तकनीक

शिपराइट का कहना है, "ऐसा नहीं है कि भारत खिलाड़ी देश नहीं है. कॉमनवेल्थ खेलों को ही देखिए. क्रिकेट में वह सबको हरा देता है. मुझे लगता है कि वह सिर्फ सॉकर पर ही ध्यान नहीं देते. कई लोग ऐसा कहते हैं कि कम लंबाई नुकसान है लेकिन मैं यह नहीं मानता, आर्सेनल टीम को ही देखिए वह कोई लंबे खिलाड़ी नहीं है. आंद्रे अर्शविन लंबे नहीं हैं. लियोनेल मेसी भी छोटे हैं लेकिन अच्छे खिलाड़ी हैं. मुझे अच्छा नहीं लगता जब लोग कहते हैं कि भारत पीछे है क्योंकि उसके खिलाड़ियों का कद कम है. यह एक बहाना है."

बसु भी मानते हैं कि भारत के पीछे रहने के पीछे और भी कारण हो सकते हैं. "मुझे लगता है भारत की समस्या दूसरी है. हमारे खिलाड़ी न तो मजबूत हैं और न ही तकनीकी तौर पर इतने अच्छे कि वह लंबाई की कमी को संतुलित कर सकें. लोग उन खिलाड़ियों की बात करते हैं जो महान हैं और छोटे हैं स्पेन के वर्ल्ड कप जीतने का उदाहरण देते हैं. तथ्य यह है कि हमें ऐसे खिलाड़ी चाहिए जो अच्छे हों और लंबे हों. हम दोनों में से किसी भी मुद्दे पर समझौता नहीं कर सकते."

रिपोर्टः रॉयटर्स/आभा एम

संपादनः वी कुमार

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