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OLD - जर्मन चुनाव

ऊंघता चुनावी अभियान

भागती गाड़ियों और सैलानियों के कैमरों की क्लिक के बीच जर्मनी के कील शहर में आम चुनाव की कोई खास गूंज नहीं सुनाई देती. यहां की व्यस्त सड़कों के बीच खंबों पर लगे अनमने, उपेक्षित पोस्टर जरूर दिखते हैं.

इन पोस्टरों को रास्ते पर चलने वाला कोई इंसान नहीं देखता. इन्हें ध्यान से देखने वाले लोगों में कुछ ही शामिल हैं, जो या तो पहली बार वोट दे रहे हैं या फिर अब दूसरी पार्टी को वोट देना चाहते हैं.

एक दिन चुनाव अभियान का

जर्मनी में संसदीय चुनावों के तीन हफ्ते पहले का एक दिन. उत्तरी राज्य श्लेस्विग होलस्टाइन की राजधानी कील. वामपंथी पार्टी डी लिंके के कार्यालय में चुनाव की गहमा गहमी, लेकिन सामने काम करने वाले सिर्फ 10 लोग. पूरे दिन मेरे साथ रहे पार्टी के छात्र कार्यकर्ता क्रिस्टोफ नोगाकी.

सुबह 10 बजे पर्यटकों की भीड़ शुरू हुई. कील के मुख्य बाजार में सभी पार्टियों के स्टैंड तो थे, लेकिन सुबह 11 बजे तक सब बंद. दोपहर 12 बजे साफ हो गया कि वामपंथी पार्टी के उम्मीदवार भारतीय मूल के राजू शर्मा तय कार्यक्रम के मुताबिक दोपहर में मतदाताओं से मिलने पार्टी के स्टैंड पर नहीं आ सकेंगे.

पार्टी के स्टैंड पर किसी के आने का इंतजार करने की बजाए शहर में माहौल का और पार्टी ऑफिस में काम का जायजा लेना बेहतर विचार लगा. कील के नए नवेले चुनाव कार्यालय में मुलाकात हुई डी लिंके पार्टी की वरिष्ठ नेता कॉर्नेलिया मोएहरिंग से.

Deutschland Bundestagswahl 2013 Die Linke in Schleswig-Holstein

कॉर्नेलिया मोएहरिंग के मुताबिक वर्चुअल सक्रियता ज्यादा

इन संसदीय चुनावों के बारे में उनका मानना है कि लोग निराश हैं. वे कहती हैं, "मतदाता चाहते तो हैं कि बदलाव हो क्योंकि वे हर पार्टी से दुखी हैं. रेड ग्रीन, ब्लैक यलो किसी भी गठबंधन से वे खुश नहीं हैं. हालांकि कोई नहीं जानता कि कैसे और कौन सी पार्टी बदलाव कर पाएगी."

पहले आएं, पहले पाएं

ये पूछने पर कि शहर में चुनाव का इतना कम माहौल क्यों है, मोएहरिंग और नोगाकी दोनों ही इस बात पर सहमत होते हैं कि चुनाव का प्रचार या माहौल फेसबुक, ट्विटर पर तो दिखाई देता है लेकिन शहर में वो उत्साह कहीं नहीं दिखता.

इसके बावजूद चुनावों के लिए खास पोस्टर, बैनर, चाबियों की चेन, लाइटर जैसे प्रमोशनल मटेरियल तो पार्टी बनाती ही है. ये कैसे सड़कों पर लगाए जाते हैं. ये जानने के लिए नोगाकी डी लिंके पार्टी के प्रबंधन कार्यालय ले गए. वहां राज्य इकाई के मैनेजर मार्को होएने से बात होने पर पता चला कि कील में बड़े पोस्टर लगाने की अनुमति नहीं है, दीवारों पर चिपकाने की तो कतई नहीं, "जिस दिन से पोस्टर लगाने की अनुमति होती है, उस रात को 12 बजे सभी पार्टियों की टीमें तैयार होती हैं. पार्टी के गढ़ के अलावा प्रीमियम जगहों पर पोस्टर लगाने का एक ही नियम है पहले आएं, पहले पाएं... जो पहले सही जगह पर पहुंच गया, उसका पोस्टर वहां लग जाता है." ये सुनकर भारतीय मन में स्वाभाविक सवाल पैदा हुआ कि फिर दूसरी पार्टी के कार्यकर्ता उसे फाड़ नहीं देते.. ये सुन कर होएने हंसे और कहा, "नहीं, लोकतांत्रिक पार्टियों में ऐसा सामान्य तौर पर नहीं होता. ये तो प्रॉपर्टी को नुकसान पहुंचाने जैसा है. हां कभी कभार ऐसा हो सकता है कि किसी पार्टी का कोई कार्यकर्ता पोस्टर फाड़ दे, लेकिन मैंने ऐसे मामले कम ही देखे हैं."

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