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ताना बाना

उल्फा प्रमुख राजखोवा जेल से रिहा

प्रतिबंधित यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) के अध्यक्ष अरबिंद राजखोवा को गुवाहाटी केंद्रीय जेल से रिहा कर दिया गया है. रिहाई शांति वार्ता की शुरुआत करने के लिए की गई है.

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बांग्लादेश में गिरफ्तारी

भारत के सबसे जाने माने भगोड़े राजखोवा को पिछले साल ढाका में गिरफ्तार किया गया था और उसके बाद भारतीय अधिकारियों को सौंप दिया गया. वे एक साल से गुवाहाटी जेल में बंद थे. दो दिन पहले सरकारी वकील के नो ऑबजेक्शन के बाद एक विशेष टाडा अदालत ने राजखोवा को जमानत दे दी थी.

जेल से बाहर निकलने पर 54 वर्षीय उल्फा अध्यक्ष ने पत्रकारों से कहा, "हम सरकार के साथ बेशर्त शांति वार्ता के पक्ष में हैं लेकिन इसका औपचारिक फैसला हमारी कार्यकारिणी में सभी कैद नेताओं की रिहाई के बाद होगा."

राजखोवा ने अपने साथियों की तुरंत रिहाई की मांग की है. उन्होंने कहा, "मैं सरकार से अपील करना चाहूंगा कि हमारे दो कैद सहयोगियों साशा चौधरी और चित्रबन हजारिका को तुरंत रिहा कर दिया जाए और बांग्लादेश में कैद अनूप चेटिया को भारत लाने के फौरी कदम उठाए जाएं ताकि वे शांति प्रक्रिया में भाग ले सकें."

पूर्वी असम के लखुआ में स्थित अपने घर जाते हुए राजखोवा कई सार्वजनिक समारोहों में हिस्सा लेंगे जहां उनका स्वागत किया जाएगा. वे 30 साल बाद अपने घर जा रहे हैं. 1979 में उल्फा के गठन के बाद से वे भूमिगत रहे हैं. अरबिंद राजखोवा की पत्नी कावेरी और उनके दो बच्चों को भी उनके साथ ही पकड़ा गया था लेकिन पुलिस ने राजखोवा के परिवार को छोड़ दिया था और उन पर कोई आरोप नहीं लगाए थे. तब से उनका परिवार अपने पुश्तैनी घर में रह रहा है.

पिछले साल मई से उल्फा के छह नेताओं को रिहा किया जा चुका है. सरकार को इस बात को स्पष्ट संकेत दिए गए हैं कि रिहाई के बाद वे सरकार के साथ शांति वार्ता के लिए तैयार हैं. उल्फा के भगोड़े कमांडर इन चीफ परेश बरुआ के अलावा उसका पूरा नेतृत्व जेल में था. राजखोवा ने कहा है कि शांति प्रक्रिया किसी भी तरह संगठन में विभाजन पैदा नहीं करेगी.

रिपोर्ट: एजेंसियां/महेश झा

संपादन: ए जमाल

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