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दुनिया

उमर अब्दुल्ला: कश्मीर समस्या 'कोई प्रशासनिक मुद्दा नहीं'

भारतीय कश्मीर के हालिया संकट को संभालने में नई दिल्ली के तरीकों से नाखुश जम्मू और कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से डॉयचे वेले ने की खास बातचीत.

8 जुलाई को हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी की एक मुठभेड़ में मौत के बाद से भारतीय कश्मीर में एक बार फिर भारत के खिलाफ हिंसक आंदोलन का खतरनाक दौर शुरु हुआ है. सन 1989 से ही इस इलाके में एक धड़ा भारतीय शासन के खिलाफ लड़ रहा है. आज करीब एक करोड़ बीस लाख की आबादी वाले भारतीय कश्मीर में 70 फीसदी आबादी मुसलमानों की है. भारत में नागरिक संगठन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कश्मीरी अलगाववादियों से भी बातचीत कर संकट को हल करने की मांग कर रहे हैं जबकि केंद्र सरकार का मानना है कि कश्मीर में हिंसा को भड़काने और माहौल खराब करने में पड़ोसी देश पाकिस्तान का हाथ है और इससे निपटने के लिए और ताकत का इस्तेमाल होगा.

भारतीय कश्मीर में करीब डेढ़ महीने से जारी कर्फ्यू के बावजूद सुरक्षा बलों के साथ हजारों कश्मीरियों की हिंसक झड़पें हुई हैं. राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और इस समय प्रमुख विपक्षी दल नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष उमर अब्दुल्ला नई दिल्ली से कश्मीरी अलगाववादियों से बातचीत कर समस्या हल करने की अपील कर रहे हैं. 46 वर्षीय अब्दुल्ला ने इस बाबत राजधानी दिल्ली में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा विपक्षी कांग्रेस के नेता राहुल गांधी से भी मुलाकात की है.

Omar Abdullah

नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष उमर अब्दुल्ला

डॉयचे वेले के साथ खास बातचीत में अब्दुल्ला ने नई दिल्ली के कश्मीर समस्या से निपटने के तरीके पर असंतोष जताया और इसे हल करने के लिए राजनीतिक उपाय तलाशने पर जोर दिया.

डॉयचे वेले: विरोधी प्रदर्शकारियों पर नियंत्रण के कड़े प्रयासों के बावजूद भारतीय कश्मीर की हालत बेहतर नहीं हुई है. क्या राज्य सरकार इसे ठीक से संभालने में असफल साबित हो रही है?

उमर अब्दुल्ला: यहां प्रदर्शन थमने का नाम ही नहीं ले रहे हैं क्योंकि सरकार यह मानने को ही राजी नहीं कि कश्मीर में समस्या है. राज्य और केंद्र सरकारें दोनों ने ही यहां जारी संकट से आंखें फेर ली हैं. जो हमें कश्मीर में नजर आती है वो एक राजनीतिक समस्या है. इसे प्रशासनिक तरीकों से नहीं संभाला जा सकेगा.

आपके विचार से इस सबका कश्मीर पर क्या असर पड़ेगा?

जब नई दिल्ली के अधिकारी कहते हैं कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, तो वे कश्मीरी लोगों की आकांक्षाओं और तकलीफों पर ध्यान नहीं देते, केवल जमीन के एक टुकड़े की बात करते हैं. भारतीय प्रशासन को केवल उस इलाके ही नहीं, उन लोगों को भी अपनाना चाहिए जो कश्मीर में रहते हैं. जब भारत के दूसरे हिस्सों में विरोध प्रदर्शन होते हैं तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तुरंत हस्तक्षेप करते हैं, क्योंकि वे उन राज्यों के लोगों को अपना समझते हैं. लेकिन कश्मीरी लोगों का गुस्सा और उनकी मांगें कभी उसी तरह से नहीं ली जाती हैं. मुझे डर है कि अगर नई दिल्ली का यही रवैया रहा तो कश्मीर आगे और भी अस्थिर होगा.

इस संकट की शुरुआत से कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की कैसी भूमिका रही है?

हम कश्मीर में विपक्ष की भूमिका में हैं लेकिन हम इस संकट का इस्तेमाल कर मुफ्ती की सरकार को गिराने की कोशिश नहीं करेंगे. हम चाहते हैं कि घाटी में हिंसा बंद हो. इन ताजा हालात के लिए मुफ्ती अपनी सरकार को छोड़कर बाकी सबको जिम्मेदार ठहराती हैं. मुझे लगता है कि अब वक्त आ गया है कि मुफ्ती जिम्मेदारी उठाएं और अपनी गलती भी मानें. हम अभी उनका इस्तीफा इसलिए नहीं मांग रहे ताकि ऐसा ना लगे कि संकट की इस घड़ी में मैं मुख्यमंत्री की कुर्सी पाने की कोशिश कर रहा हूं.

प्रधानमंत्री मोदी के स्वाधीनता दिवस के भाषण में कश्मीर संकट का कोई जिक्र नहीं था. इससे उनके नजरिए के बारे में क्या पता चलता है?

अगर प्रधानमंत्री अपने स्वाधीनता दिवस के भाषण में पाकिस्तान के बलूचिस्तान में हो रहे मानव अधिकारों के हनन पर बात करना चाहते हैं, तो बेशक कर सकते हैं. लेकिन हम चाहेंगे कि वे कश्मीर के बारे में भी बात करें जो 40 दिनों से भी लंबे समय से हिंसा की चपेट में है.

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