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दुनिया

उपेक्षित बीमारियों की रिसर्च में जुटी डॉक्टरों की एक टीम

दुनिया की 90 फीसदी आबादी को प्रभावित करने वाली बीमारियों के शोध में विश्व के कुल मेडिकल रिसर्च फंड का केवल 10 फीसदी खर्च होता है. घाना में रिसर्चरों ने मिलकर उपेक्षित बीमारियों पर रिसर्च करने का बीड़ा उठाया है.

घाना के केंद्र में बसे शहर अगोगो में रिसर्चर जॉन अमुआसी और उनकी टीम कई बार थेरेसा सारपोंग के घर जा चुकी है. हाल ही में उनकी दो साल की बेटी मिशेले को गंभीर डायरिया हो गया था. अब थेरेसा की बेटी ठीक है, लेकिन जब वह बीमारी पड़ी तो मां को बहुत चिंता हो गई थी. वह कहती हैं, "मैं उसे लेकर चिंतित हो गई. वह बहुत ही कमजोर हो गई थी और छोटे बच्चे तो ऐसे में मारे भी जा सकते हैं."

मिशेले को बहुत ही संक्रामक डायरिया, क्रिप्टोस्पोरिडियोस हो गया था. अपनी रिसर्च टीम के साथ जॉन अमुआसी इस पर काफी समय से शोध कर रहे हैं. वह जानना चाहते हैं कि आखिर ये बीमारी फैलती कैसे हैं. इसीलिए वह मिशेले के घर तक पहुंचे. जॉन अमुआसी कहते हैं, "लोग बेहद चिंता में पड़ जाते हैं, उन्हें लगता है कि यह कोई बेहद गंभीर बीमारी है, इसीलिए शहर से सफेद कपड़ों और दस्तानों में लोग आए हैं, खून के नमूने ले रहे हैं. हमें इससे दूर रहना चाहिए."

अगोगो के अस्पताल में अब क्रिप्टोस्पोरिडियोस के गंभीर असर को माना जा रहा है. उन्हें लगता है कि ये नकारी गई ट्रॉपिकल बीमारी है, जिसके ऐसे मामले सामने आते हैं. इसी अस्पताल में बुरुली उल्कर के रोगियों का इलाज हो रहा है. ये त्वचा के इंफेक्शन की एक बीमारी है, इसके फैलने का सटीक कारण भी अब तक पता नहीं है. इसे भी नकारी गई ट्रॉपिकल बीमारी माना जाता है.

यहां रोगी भाग्यशाली है, क्योंकि यह अस्पताल बीमारी को नकारने के बजाय उस पर होने वाली रिसर्च में हिस्सा लेता है. इसी वजह से लोगों का मुफ्त इलाज भी किया जाता है. रिसर्चर जॉन अमुआसी कहते हैं "हमारा फोकस ऐसे मरीजों पर है, जिन्हें नकारा जाता रहा है. ये ऐसे गरीब लोग हैं जो दवा हो भी तो उसका खर्च नहीं उठा सकते. उन तक नहीं पहुंच सकते. ये वाकई अनदेखी झेलने वाले लोग हैं."

अमुआसी अफ्रीकन रिसर्च नेटवर्क के प्रमुख हैं. यह नेटवर्क ऐसी बीमारियों से निपटने के लिए नीतियां बनाने पर जोर दे रहा है. मकसद है कि ऐसी दुलर्भ बीमारियों को पूरी तरह खत्म किया जाए. अमुआसी अफ्रीकी देशों की सरकारों और अमीर लोगों को साथ लाना चाहता है. फिलहाल टेस्ट के जमा किये गए नमूने यूरोप भेजे जाते हैं, क्योंकि घाना में एनालिसिस के लिए जरूरी उपकरण नहीं हैं.

अमुआसी कहते हैं "निराशा तब होती है जब आपमें कुछ करने की क्षमता हो लेकिन उसके लिए जरूरी औजार न हों. मैं इस निराशा को जानता हूं. आप जानते हैं कि आप एक जिंदगी बचा सकते हैं, आप ये कर सकते हैं लेकिन औजार नहीं हैं. उत्तरी अमेरिका और यूरोप से ट्रेनिंग लेने के बाद कई लोग वापस अफ्रीकी देशों में आते भी हैं. लेकिन वे फिर लौट जाते हैं क्योंकि कुछ महीनों में उन्हें अहसास हो जाता है कि यहां मैं अपनी बेस्ट सेवा नहीं दे सकता. और अंत में वे लौट जाते हैं."

क्या अमुआसी भी वापस अमेरिका चले जाएंगे, जहां उन्होंने पढ़ाई की. अमुआसी कहते हैं, बिल्कुल नहीं. फिलहाल वह नेटवर्किंग के लिए दुनिया भर में घूम रहे हैं. घाना के चक्कर भले ही कम लगें लेकिन उनका पूरा फोकस वहां के लोगों की सेहत पर है.

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