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दुनिया

उनको लुभा रहा है अपना देश

भारतीय वैज्ञानिकों और इंजीनियरों में अब भी बेहतर करियर के लिए विदेश जाने की ललक भले कम नहीं हुई हो, डाक्टरों के मामले में ठीक इसका उल्टा हो रहा है.

विदेशों में काम करने वाले डाक्टर अब हर साल भारी तादाद में भारत लौट रहे हैं. देश में विदेशों की तर्ज पर आधुनिकतम अस्पातल खुलने और कामकाज के बेहतर मौके ने इस रिवर्स ब्रेन ड्रेन को बढ़ावा दिया है.

तमिलनाडु के रहने वाले डा. पाल रमेश ने बेहतर प्रशिक्षण और पैसे कमाने की ललक में नब्बे के दशक में ब्रिटेन का रुख किया था. कोई डेढ़ दशक तक विदेशियों का इलाज करने वाले रमेश अब भी ज्यादातर विदेशियों का ही इलाज करते हैं. लेकिन अब जगह बदल गई है. अब वह अपने गृह राज्य में चेन्नई के अपोलो अस्पताल में यह काम कर रहे हैं. रमेश कहते हैं, "कुछ साल पहले मैं जब स्वदेश लौटा तो यह एक अपवाद था. लेकिन अब तो यह परंपरा बन गई है." देश की स्वास्थ्य राजधानी के तौर पर उभरे चेन्नई में इस क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञ इसे रिवर्स ब्रेन ड्रेन करार देते हैं. अब राज्य के ज्यादातर डाक्टर यूरोप और अमेरिका में मलाईदार नौकरियां छोड़ कर यहां लौट रहे हैं.

चेन्नई ही नहीं, देश के दूसरे शहरों में भी यही हालत है. अपोलो अस्पताल को हर साल औसतन ब्रिटेन और दूसरे देशों में काम करने वाले तीन सौ डाक्टरों के नौकरी के आवेदन मिलते हैं. लेकिन आखिर इसकी वजह क्या है. इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की तमिलनाडु शाखा के अध्यक्ष एम. बालसुब्रमण्यम कहते हैं, "यहां अब चिकित्सा की तकनीक यूरोपीय देशों को टक्कर दे रही है. इसके अलावा रहन-सहन का स्तर भी पहले के मुकाबले काफी सुधरा है." उनकी दलील है कि जब तमाम सुविधाएं और बेहतर वेतन यहीं मिल रहा है तो लोग हजारों मील दूर परदेस में क्यों जाएंगे ? आईएमए की पश्चिम बंगाल शाखा के एक अधिकारी डाक्टर प्रशांत चटर्जी भी इस दलील का समर्थन करते हैं.

अपोलो अस्पताल के एक चिकित्सक प्रमोद घोष कहते हैं, "अब प्रतिभा पलायन की दिशा बदल रही है. विदेशों से लगातार डाक्टर भारतीय अस्पतालों में लौट रहे हैं." घोष भी तीन साल पहले अमेरिका से लौटे हैं. उनकी दलील है कि भारतीय डाक्टर पहले इसलिए विदेशों का रुख करते थे कि यहां न तो प्रशिक्षण की वैसी उन्नत सुविधाएं थी और न ही कामकाज के बेहतर मौके थे. अब ऐसे लोग अपने देश में लौट कर अपने विदेशी प्रशिक्षण का यहां इस्तेमाल कर सकते हैं.

बालसुब्रमण्यम कहते हैं, "अब हवा का रुख बदल रहा है. चेन्नई समेत पूरे देश में खुलने वाले कार्पोरेट अस्पतालों ने विदेशों में रहने वाले भारतीय डाक्टरों को लुभाना शुरू कर दिया है. विदेशों से लौटने वाले डाक्टरों को स्थानीय लोगों के अलावा यहां विदेशी मरीजों के इलाज का भी भरपूर मौका मिलता है." यूरोप और अमेरिका के मुकाबले यहां इलाज बेहद सस्ता होने की वजह से भारी तादाद में विदेशी मरीज इन अस्पतालों में पहुंच रहे हैं.

मोटे आंकड़ों के मुताबिक, अकेले अपोलो अस्पताल (चेन्नई) में ही सालाना 70 हजार विदेशी मरीज आ रहे हैं. इसलिए तमाम कार्पोरेट अस्पतालों ने अंतरराष्ट्रीय मरीजों को डील करने के लिए एक नया विभाग ही खोल दिया है. वहां दुभाषियों की भी नियुक्ति की गई है ताकि मरीजों को भाषा की कोई समस्या नहीं हो.

कोई पंद्रह साल से न्यूजीलैंड में काम करने वाले डाक्टर शुभमय बनर्जी पिछले साल ही कोलकाता के एक अस्पताल में लौटे हैं. उनका कहना है, "विदेशी मरीज जानते हैं कि अब यहां काम करने वाले ज्यादातर डाक्टर विदेशों के नामी अस्पतालों में काम कर चुके हैं. इससे डाक्टर के प्रति उनका भरोसा मजबूत होता है."

लेकिन विदेशों से लौटने वाले इन डाक्टरों का कहना है कि अब भी भारत में स्वास्थ्य के क्षेत्र में बहुत कुछ किया जाना है. विदेशों में एक संगठित सिस्टम है. लेकिन यहां ऐसा नहीं है. ब्रिटेन से लौटे डाक्टर सुकुमार दासगुप्ता कहते हैं, "यहां अब भी ज्यादा लोग बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित हैं. ज्यादातर लोग इलाज का खर्च नहीं उठा सकते." इन लोगों का कहना है कि विदेशों की तर्ज पर यहां भी ज्यादातर आबादी को स्वास्थ्य बीमा के दायरे में लाना जरूरी है. इसके अलावा एक अन्य दिक्कत यह है कि विदेशों में जहां काम-काज का समय तय है, वहीं यहां डाक्टरों को अक्सर लंबे समय तक लगातार काम करना पड़ता है.

वैसे, इन छोटी-मोटी दिक्कतों के बावजूद विदेशों से आने वाले डाक्टरों की सूची लगातार लंबी होती जा रही है. अब तो हालत यह है कि किसी भी बड़े अस्पताल में शायद इक्का-दुक्का ही ऐसे डाक्टर नजर आते हैं जिन्होंने विदेशों में लंबा वक्त नहीं गुजारा हो.

रिपोर्ट: प्रभाकर, कोलकाता

संपादन: महेश झा

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