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दुनिया

उत्पादन है पर पीने को दूध नहीं

दूध अभी भी विलासिता की चीजों में शुमार होता है, शायद इसीलिए यूपी में दूध का उत्पादन भारत में सबसे अधिक होने के बावजूद बच्चों को पीने को नसीब नहीं होता.

उत्तर प्रदेश की आबादी करीब करीब ब्राजील के बराबर है, लेकिन गरीबी रेखा के अंतरराष्ट्रीय मानक के हिसाब से विश्व के आठ फीसदी गरीब यहीं रहते हैं. प्रति व्यक्ति प्रति दिन 1.08 डॉलर की आमदनी गरीबी का अंतरराष्ट्रीय मानक है. भारत की गरीबी रेखा के मानक भी बताते हैं कि करीब छह करोड़ गरीब यूपी में बसते हैं. यानी देश के 20 फीसदी गरीब हैं यहां. इसी का नतीजा है कि दूध निकाल कर बेच देते हैं, पी नहीं पाते. भारत सरकार के पशुधन विभाग के आंकड़े बताते हैं कि देश में सबसे अधिक पंजाब में प्रति व्यक्ति प्रति दिन 945 ग्राम दूध की उपलब्धता है. इसके बाद हरियाणा में 720 ग्राम है. हिमाचल में 447, गुजरात में 445, आंध्र प्रदेश में 391 ग्राम और बिहार में 175 ग्राम है. यूपी में देश में सबसे अधिक दुधारू मवेशी हैं और यहां देश में सबसे अधिक दुग्ध उत्पादन होने के बावजूद दूध की उपलब्धता प्रति व्यक्ति प्रति दिन सिर्फ 310 ग्राम है.

शहरों में बिक्री

यूपी की करीब 20 करोड़ की आबादी में 16 करोड़ लोग गांवों में रहते हैं. इसीलिए पशुपालन की परंपरा अभी बाकी है और दूध भी सबसे अधिक पैदा हो रहा है. वर्ष 2012-13 में यूपी दुग्ध उत्पादन में देश भर में अव्वल रहा जब 233 लाख मीट्रिक टन दूध का उत्पादन हुआ. वर्ष 2013-14 में दिसम्बर 2013 तक 172 लाख मीट्रिक टन दूध पैदा हुआ. लेकिन इतना दूध गया कहां. इसके जवाब में पशुपालन विभाग के निदेशक रुद्र प्रताप सिंह बताते हैं कि पिछले 10 साल में आइसक्रीम के बढ़ते चलन ने 35 फीसदी दूध को हड़प लिया. पनीर का इस्तेमाल भी 65 गुना बढ़ गया है. इसके अलावा दूध का बहुत बड़ा हिस्सा दिल्ली चला जाता है. पश्चिमी यूपी का तो लगभग 80 फीसदी दूध दिल्ली ले जाकर बेचा जाता है. उनके अनुसार दूध के अन्य उत्पाद भी अब पहले की अपेक्षा बाजार में अधिक आते हैं और जबसे फास्ट फूड कल्चर आया है दूध पीने की आदत भी कम हो गई है.

पराग डेयरी के वरिष्ठ प्रबंधक अनिल सिंह इस तथ्य से सहमत हैं लेकिन उनके अनुसार दूध की खपत कम होने का सबसे बड़ा कारण स्वास्थ्य में आ रही गिरावट है. बताते हैं कि पहले डॉक्टर दूध पीने की सलाह दिया करते थे लेकिन डॉक्टर भी दूध के बिना बच्चों के लालन पालन को गलत नहीं बताते. बच्चों के डॉक्टर आशुतोष वर्मा एक किस्सा बताते हैं कि एक परिवार ने जब उनसे बताया कि बच्चा होने के बाद उन लोगों ने उसके लिए एक गाय खरीद ली है, तो वे हंसे और अपनी क्लीनिक में लगा पोस्टर उन लोगों को दिखाया जिसमें गाय के दूध को बछड़े का अधिकार बताया गया है. डॉ. वर्मा के अनुसार बच्चे को मां के अलावा किसी का दूध न दिया जाए तो उसके स्वास्थ्य पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता बशर्ते कि उसका खान पान औसत से थोड़ा सा बेहतर हो. उन्होंने कहा कि आक्सीटाक्सिन और अन्य घातक रसायनों की मिलावट वाले दूध से बेहतर है कि बच्चों को दूध के बिना पाला जाए.

कमाने का जरिया

दूध अब खान पान की चीजों की प्राथमिकता में भी नहीं रहा. शेफ आदर्श कुमार बताते हैं कि व्यंजनों की वैराइटी अब इतनी बढ़ चुकी है कि दूध का नंबर भी नहीं आता. यह अलग बात है कि पुरानी दिल्ली और लखनऊ के पुराने इलाकों में अभी भी केसरिया दूध के बड़े बड़े कढ़ाव अभी भी रात में चढ़ते हैं. इस परिप्रेक्ष्य में यह जान लेना भी दिलचस्प है कि देश के सबसे बड़े राज्य यूपी में पशुओं की जनगणना के 2007 के आंकड़ों के अनुसार यहां भैसों की संख्या दो करोड़ 64 लाख, गायों की संख्या एक करोड़ 90 लाख और बकरियों की संख्या एक करोड़ 48 लाख है.

यूपी में प्रति भैंस प्रति दिन दूध देने का औसत 4. 252 किलोग्राम है जबकि गाय का 3.139 किलोग्राम है. लेकिन इस असलियत से लखनऊ विश्वविद्यालय के मानव शास्त्र के प्रोफेसर रणवीर सिंह को भी इनकार नहीं है कि यूपी की गरीबी ने दूध पीने के बजाए उसे बेचने पर मजबूर किया. उनके अनुसार हमने अपनी किताबों में भारत को दूध की नदियां बहने वाले देश के रूप में जाना है लेकिन वास्तविकता कुछ और ही है.

रिपोर्ट: एस. वहीद, लखनऊ

संपादन: महेश झा

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