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दुनिया

उत्तर कोरिया से बातचीत भी आसान नहीं

कई हफ्तों तक धमकियों और परमाणु जंग की आशंका से गर्म रहने के बाद कोरियाई प्रायद्वीप में ध्यान अब संवाद पर है लेकिन जानकारों की माने तो औपचारिक बातचीत का रास्ता लंबा और कहीं ज्यादा चुनौतियों से भरा है.

ये चुनौतियां इतनी बड़ी हैं कि कई जानकार तो यहां तक कह रहे हैं कि बातचीत वास्तव में विकल्प है ही नहीं. उनकी यह राय इस आधार पर टिकी है कि एक तरफ उत्तर कोरिया परमाणु राष्ट्र का दर्जा हासिल करने को व्याकुल है तो दूसरी तरफ अमेरिका किसी भी हाल में यह मानने को तैयार नहीं, ऐसे में बातचीत से भला क्या हासिल होगा. तीन परमाणु परीक्षण कर चुका उत्तर कोरिया अब वो देश नहीं रहा जिसने 1994 में अमेरिका के साथ परमाणु समझौता किया था या फिर वह जिसने 2005 में छह देशों के साथ बातचीत में परमाणुनिरस्त्रीकरण के समझौते तक बात पहुंचाई थी.

पिछले हफ्ते सियोल, बीजिंग और टोक्यो का दौरा कर लौटे अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी लगातार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि अगर उत्तर कोरिया अपने परमाणु कार्यक्रम पर रोक लगाने में गंभीर हो तो अमेरिका बातचीत को तैयार है. उत्तर कोरिया ने इसके जवाब में जरूरी शर्तों की एक सूची जारी कर दी है जिसमें सबसे प्रमुख है संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों को हटाना.

उत्तर कोरिया के जवाब को कुछ आशावादी जानकार अच्छा मान रहे हैं. उनका कहना है कि उत्तर कोरिया की मांग चाहे कितनी भी अव्यवहारिक और बातचीत का रास्ता चाहे जितनी भी चुनौतियों से भरा हो उसका स्वागत किया जाना चाहिए. उधर जॉन केरी ने उत्तर कोरियाई जवाब को 'शुरुआती चाल' और 'जाहिराना' तौर पर न मानने योग्य होते हुए भी माना कि कम से कम चर्चा का दरवाजा खुला है.

बड़ा सवाल यह है कि आखिर ये बातचीत कहां जाएगी. अगर उत्तर कोरिया की मांग अवास्तविक है तो ऐसी स्थिति में कुछ जानकारों का मानना है कि अमेरिका यह समझ रहा है कि उसके पास कोई रास्ता है जिससे कि वह उत्तर कोरिया को परमाणु हथियारों को मिटाने पर राजी कर लेगा. उत्तर कोरिया ने परमाणु हथियारों को हासिल करने जितना पैसा और ताकत खर्च किया है उससे यह साबित हो जाता है कि वह इनका इस्तेमाल सिर्फ सौदेबाजी के मोहरों के रूप में नहीं करना चाहता. सेंटर फॉर स्ट्रैटजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के विक्टर चा कहते हैं, "वास्तव में वह खुद को दुनिया में परमाणु ताकत के रूप में स्वीकार किया जाना चाहता है. उन्हें खारिज करना संभव नहीं होगा.

इंटरनेशल क्राइसिस ग्रुप से जुड़े उत्तर कोरिया के जानकार डैनियल पिंक्सटन का मानना है कि मौजूदा कूटनीति उत्तर कोरिया के बारे में यह भ्रम पाले हुए है कि वह झुकने की स्थिति में है. पिंक्सटन की दलील है कि उत्तर कोरिया "सबसे पहले सेना" की नीति पर चलने वाला देश है जिसकी कमान युवा नेता किम जोंग उन के हाथों में है और इसका मतलब है कि यह शासन ताकत के बल पर राज करने में यकीन रखता है जिसका झुकना नामुमकिन है. पिंक्सटन का कहना है, "वह कहीं नहीं जाने वाला है."

जो लोग मानते हैं कि उत्तर कोरिया के साथ बातचीत से कुछ हासिल नहीं होगा, उनकी राय है कि ताकत के बल पर काबू कर के ही उत्तर कोरिया का हल किया जा सकता है. उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम के प्रमुख जानकार सीगफ्रीड हेकर की भी यही राय है. उनका कहना है, "कुछ समय से यह साफ हो गया है कि उत्तर कोरिया अपना परमाणु कार्यक्रम नहीं छोड़ेगा. ऐसे में हमें ध्यान रख कर यह तय करना होगा कि स्थिति एकदम बेकाबू न हो जाए."

बातचीत के पक्षधर कह रहे हैं कि कूटनीति से भले ही हल न निकल सकता हो लेकिन इससे उसे ढूंढने में मदद जरूर मिल सकती है. उत्तर कोरिया के लिए पूर्व अमेरिकी वार्ताकार जोएल विट का कहना है कि उत्तर कोरिया के साथ संपर्क जरूरी है ताकि उसके इरादों का पता चल सके यह काम वहां की सरकारी मीडिया के भरोसे नहीं हो सकता.

कोरियाई प्रायद्वीप फरवरी में उत्तर कोरिया के तीसरे परमाणु परीक्षण करने के बाद से ही तनाव में घिर गया है. उत्तर कोरिया ने अपनी धमकियों का सुर भले ही पिछले दिनों में कुछ नीचे किया हो लेकिन तनाव और खतरा इतना ज्यादा है कि कहीं से कोई गलती की चिंगारी यहां के बारुद को ज्वालामुखी बना देगी. इस महीने की शुरुआत में काएसोंग औद्योगिक क्षेत्र में दक्षिण कोरियाई लोगों को आने पर उत्तर कोरिया ने रोक लगा दी जो अब तक जारी है. उत्तर कोरिया ने इसे खोलने का कोई संकेत नहीं दिया है.

ऐसे हालात में एक स्थिति यह भी बनती है कि अमेरिकी इन दोनों पड़ोसियों को आपस में ही निबटने दे और खुद तस्वीर से बाहर हो जाए या कम से कम दूरी बना ले. अमेरिकी थिंक टैंक प्लफशेयर्स फंड के कार्यक्रम निदेशक पॉल कैरल का मनना है कि अमेरिका इस बात के इंतजार में है कि दक्षिण कोरिया बातचीत शुरू करने और आगे ले जाने की जिम्मेदारी संभालेगा. उनका मानना है कि यह नीति अमेरिका को घरेलू राजनीति में भी फायदा देगी. उनके मुताबिक अमेरिका दक्षिण कोरिया को आगे रख कर बातचीत के रास्ते पर बढ़ सकता है. कैरल तो यह मानते है कि मई के शुरुआत में राष्ट्रपति बराक ओबामा और दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति पार्क ग्वेन हाइ के बीच इसी नीति पर बात होगी. हालांकि इसके बाद भी वह कहते हैं कि संवाद आसान तो नहीं लेकिन फिर भी अच्छा रास्ता तो है ही.

एनआर/ओएसजे (एएफपी)

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