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दुनिया

उत्तर कोरियाई हमले की आशंका से सहमे जापानी

उत्तर कोरिया और अमेरिका के बीच पनपता तनाव जापान में डर पैदा कर रहा है. जापान में अमेरिकी सैन्य अड्डों के पास रहने वाले लोग चिंतित हैं कि अगर अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच युद्ध हुआ तो वे सबसे पहले इसका शिकार बनेंगे.

जापान के फुसा शहर में रहने वाले 58 वर्षीय टैक्सी ड्राइवर सिजिरो कुरोसावा कहते हैं कि भविष्य में उनके लिये स्वयं को युद्ध से बचाना असंभव होगा. उन्होंने बताया "उनके पास बंकर, शेल्टर जैसा कुछ नहीं है. कंपनी ने ये निर्देश जरूर दिये हैं कि हमले की स्थिति में गाड़ी पार्क कर तुरंत कहीं शरण लें लेकिन मुझे नहीं पता कि ऐसी स्थिति में मैं कहां शरण लूंगा".

संभावित मिसाइल हमले में जापान क्या करेगा, जैसे विषयों पर बहसें इन दिनों जापान की मीडिया में खूब चल रही हैं. हाल के हफ्तों में उत्तर कोरिया के रॉकेट परीक्षण और कोरियाई प्रायद्वीप में अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के विमानवाहक पोत को भेजे जाने जैसी खबरों ने यहां तनाव पैदा कर दिया है. उत्तर कोरिया के पास अमेरिका तक मार करने वाली कोई परमाणु मिसाइल अभी नहीं है लेकिन उत्तर कोरिया की मौजूदा क्षमता जापान के अमेरिकी सैन्य अड्डों में तैनात 50 हजार अमेरिकी दस्तों को निशाना बना सकती है. यह जापान के लिए एक बड़ी चिंता है.

बीते मार्च में उत्तर कोरिया की ओर से चार बैलास्टिक मिसाइलों के परीक्षण के बाद जापान सरकार ने सतर्कता बढ़ा दी थी. इसी दौरान उत्तर कोरिया की एक मिसाइल जापान के समुद्री क्षेत्र में भी गिरी थी. जापान के अखबार और टीवी कार्यक्रमों के मुताबिक कुछ अमीर लोगों ने न्यूक्लियर शेल्टर के लिये ऑर्डर किया है. वहीं किफायती विकल्प के रूप में गैस मास्क की भी मांग बढ़ी है. वैसे तो 58 हजार की आबादी वाले फुसा शहर में हमेशा से ऐसी मांग रही है लेकिन इस बार हालात कुछ अलग हैं. इसी शहर में कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें ऐसी संभावनायें नजर नहीं आतीं. योकोटा एयर बेस के पास जूता रिपेयर करने की दुकान चलाने वाले 34 वर्षीय जुमपेई टेकमिया कहते हैं कि "जो होगा वो होगा". टेकमिया को संदेह है कि क्या योकोटा पहला निशाना बनेगा. उन्होंने कहा "मुझे शक है ऐसा होगा, और मुझे कोई खास डर नहीं लग रहा है."

लेकिन उत्तर कोरिया और अमेरिका के बीच बढ़ते जा रहे तनाव ने यहां के लोगों को दूसरे विश्व युद्ध की याद भी दिला दी है. 75 वर्षीय योशियो टाकागी बताते हैं कि दूसरे विश्व युद्ध के दौरान उन्हें अन्य लोगों के साथ अस्थायी रूप से एक गांव में भेज दिया गया था ताकि वे लोग अमेरिकी बमबारी से बच सकें. उन्होंने बताया कि उस बमबारी में उनके दो बड़े भाई मारे गये थे. 

एए/आरपी (एएफपी)

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