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ब्लॉग

उत्तराखंड में आखिर कब होगी जनता की जीत?

अब जबकि सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस के नौ बागियों की याचिका को खारिज कर दिया है और नैनीताल हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है, 12 जुलाई को इन बागियों की अगली सुनवाई होगी.

10 मई को सदन के भीतर होने वाले शक्ति परीक्षण में ये विधायक हिस्सा नहीं ले पाएंगें. यही गुहार लगाते हुए ये लोग आननफानन में आज सुबह हाईकोर्ट के फैसले के फौरन बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे. पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के बहुमत परीक्षण में अब 61 विधायक ही हिस्सा ले पाएंगें जिनमें से सिर्फ 27 विधायक बीजेपी के पास है. यानि यह साफ है कि सदन के भीतर अगर कोई असाधारण स्थिति नहीं आती है, तो फ्लोर टेस्ट में हरीश रावत की जीत तय है. खबरें मिल रही हैं कि बीजेपी उत्तराखंड में 1991 में यूपी विधानसभा के भीतर समाजवादी पार्टी के एक प्रयोग को दोहरा सकती है, जब पार्टी के सभी विधायकों ने एक साथ इस्तीफा दे दिया था. लेकिन इसके निहितार्थ और परिणाम उत्तराखंड में उस तरह से शायद ही हों, जैसे उस समय उत्तर प्रदेश में थे. उस समय समाजवादी पार्टी बीएसपी के साथ साझा सरकार में शामिल थी.

सत्ता में चूहेबिल्ली का खेल

उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य में होना तो यह चाहिए था कि जनता के बुनियादी अधिकारों और विकास के मुद्दों पर बहस होती, लेकिन सारी बहस सत्ता-राजनीति और कुर्सी की छीनझपटी के इर्दगिर्द घूम रही है. और इसे विडंबना की तरह समझें कि आम लोग भी इन घटनाओं को बाकायदा सनसनी की तरह देख सुन रहे हैं. कहीं से कोई आक्रोश की आवाज नहीं आती कि एक राज्य में आखिर किस चीज को दांव पर लगाकर, राजनैतिक दल सत्ता में यह चूहेबिल्ली का खेल कर रहे हैं. जंगल के जंगल जल रहे हैं. पीने के पानी की किल्लत है. सड़कें बिजली स्कूल अस्पताल चरमराई व्यवस्था के साए में काम कर रहे हैं. रोजगार के अवसर सिकुड़ते जा रहे हैं. पर्यटन में एक ठोस ढांचे का अभाव है. पलायन आज पहाड़ों की विकराल समस्या बन गया है. तो ये मुद्दे थे जिन पर उत्तराखंड में आज बहस ही नहीं कार्रवाई भी होनी थी. लेकिन जो हो रहा है, वह जनता से दूर और सत्ता के करीब है.

ऐसा भी पहली बार हो रहा है कि अनुच्छेद 356 के इस्तेमाल को लेकर केंद्र और किसी राज्य सरकार की टकराहट न सिर्फ इतनी लंबी खिंच गई है, बल्कि यह एक ऐसे मोड़ में पहुंच गई है, जहां एक दूसरे पर कीचड़ उछालने के सिवाय कुछ और किसी को नहीं सूझ रहा है. न कोई नाक इतनी लंबी हो सकती है, न ही नाक की लड़ाई. यह हम जैसे किसी राजघरानों-रजवाड़ों की लड़ाई देख रहे हैं, बस फर्क इतना है कि मैदान पर घोड़े हाथी, तोप तलवार और रक्तपात नहीं दिखता.

गलतियों का सिलसिला जारी

इस प्रकरण ने सत्ता राजनीति के चरित्र की भयानकता दिखा दी है. कई स्याह पहलू उजागर हुए हैं. देखा जा रहा है कि दलबदल कानून को लेकर संविधान की व्याख्याओं को तो छोड़िए, उनके आधार पर अदालती आदेशों को जैसे ठेंगा दिखाने की जुर्रतें भी बढ़त जा रही हैं. राजनैतिक दल सत्ता के लिए घनघोर आकांक्षी होते जा रहे हैं और राज्यों में सरकारों के मुखिया का अपने सहयोगियों के साथ कोई संवाद नहीं रह गया है. नेतागण राजनैतिक निष्ठा और पार्टी मूल्यों की वजह से एकजुट नहीं होते दिख रहे, बल्कि निष्ठाओं की परिभाषा बदल रही है, मूल्य सिर्फ निजी स्वार्थ का नाम हो गया है.

इस साल 18 मार्च तारीख से गलतियों का सिलसिला जारी है. पार्टियों और नेताओं के अहम टकराते रहे और कोई रास्ता निकलने के बजाय मामला कानूनी पेचीदगियों में उलझता चला गया.

और यहां पर मीडिया का भी एक बड़ा हिस्सा सवालों मे घिरा है. वह इस या उस पक्ष के हितों की ही जोशोखरोश से कवरेज करता नजर आता है. आखिर इन पक्षों में वह पक्षकार क्यों बनता है? इसका अर्थ यह भी है कि सत्ता राजनीति, कॉरपोरेट और मीडिया का गठजोड़ इस देश में और शायद विश्व में अन्य जगहों पर भी लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में गतिरोध ला सकता है और मुद्दों को भटकाता हुआ प्रतिरोध के पर्यावरण को भी बनने से रोकता रह सकता है.

सत्ता संरचनाओं के पतन का नया दौर

साल 2000 में जिन तीन राज्यों का गठन हुआ था, उनमें उत्तराखंड के अलावा छत्तीसगढ़ और झारखंड भी हैं. छत्तीसगढ़ में दो बार मुख्यमंत्री पद पर बदलाव हुए हैं. झारखंड में सात बार और उत्तराखंड में आठ बार. नौवें की तैयारी है. और कांग्रेस और बीजेपी बारी बारी से इस राज्य में शासन करती आई हैं. दोनों ही दलों के भीतर घात-प्रतिघात और बगावतों का बोलबाला रहा. बीजेपी में चार चार बार सीएम बदल दिए गए. इतनी उठापटक पार्टी के भीतर रही है. और वही घमासान अब कांग्रेस में भी खुलकर आ गया है. उत्तराखंड मे पूरे पांच साल शासन करने का अब तक का रिकॉर्ड कांग्रेसी मुख्यमंत्री एनडी तिवारी का ही है.

उत्तराखंड के इस ताजा संकट से दो बातें स्पष्ट हुई हैं. एक तो अदालतों ने संवैधानिक व्यवस्थाओं की गरिमा को पुनर्स्थापित किया है. वे विचलित नहीं हुई हैं. दूसरी बात यह है कि राजनैतिक सत्ताएं अब दलगत निष्ठाओं की नैतिकता को बोझ मानते हुए उतारकर फेंक चुकी हैं. सत्ता संरचनाओं के पतन का यह एक नया दौर है.

ब्लॉगः शिवप्रसाद जोशी

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