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ताना बाना

ईस्ट इंडिया कंपनी की पहचान फिर पाने की चाह

एक समय भारत पर राज करने और औपनिवेशिक दौर का रास्ता साफ करने वाली ईस्ट इंडिया कंपनी को फिर से व्यापार जगत के नक्शे में स्थापित करने की कोशिश हो रही है. लेकिन इस बार यह प्रयास एक भारतीय व्यवसायी की ओर से हो रहा है.

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ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में फिर से अपनी पहचान बढ़ा रही है और जुलाई में लंदन के मेफेयर इलाके में लक्जरी सामान का शोरूम खोलने जा रही है. 1600 में ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना हुई और दुनिया के जाने पहचाने नामों में यह कंपनी भी शुमार है.

एक समय ब्रिटेन की वर्कफोर्स के एक तिहाई लोग ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम करते थे और वैश्विक व्यापार के 50 फीसदी हिस्से पर कंपनी की मुहर थी. यहीं से दुनिया में ब्रिटेन का प्रभाव बढ़ाने और उसका चेहरा बदलने की नींव पड़ी.

महारानी विक्टोरिया ने 1874 में कंपनी का राष्ट्रीयकरण कर दिया था. करीब 100 साल बाद ईस्ट इंडिया जैसे मजबूत ब्रैंड को पुनर्जीवित किया गया और इसके लिए कई उद्यमियों ने प्रयास किए. ब्रिटेन की ट्रेजरी ने ईस्ट इंडिया कंपनी नाम और मूल ट्रेडमार्क इस्तेमाल करने की इजाजत दे दी.

संजीव मेहता ने यह कंपनी 2005 में खरीदी और करीब डेढ़ करोड़ डॉलर का निवेश इस कंपनी में किया है. मेहता का कहना है कि कंपनी का ब्रैंड एक समय काफी ताकतवर रहा है और यह अपने साथ विरासत, उत्पाद और स्त्रोत को ला सकता है. जो दुनिया की किसी और कंपनी के पास नहीं है.

संजीव मेहता के मुताबिक विभिन्न संस्कृतियों, देशों और सामग्रियों में तालमेल बैठाने की कोशिश होगी जो कंपनी के हर प्रोडक्ट और सर्विस में दिखाई देगी. जुलाई में कंपनी की लंदन के मेफेयर इलाके में लक्जरी फाइन फूड स्टोर खोलने की योजना है.

यह बिजनेस बाद में एशिया, मध्य पूर्व और अमेरिका तक फैलेगा और इसके लिए रिटेल, ईकॉमर्स और थोक के जरिए व्यापार करने की रणनीति बनाई जाएगी. कंपनी पेय पदार्थों, फर्नीचर, सजावटी सामान, प्रकाशन, ज्वैलरी और रियल एस्टेट में हाथ आजमाने की कोशिश भी कर रही है.

अगले पांच सालों के लिए 10 करोड़ डॉलर के निवेश की योजना बनाई गई है. मेहता का कहना है, "ईस्ट इंडिया कंपनी के पास कई प्रोडक्ट्स, क्षेत्रों और देशों में विस्तार के असीमित अवसर हैं. हम बेहतरीन विरासत को आगे बढ़ाना चाहते हैं."

रिपोर्ट: एजेंसियां/एस गौड़

संपादन: महेश झा

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