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दुनिया

ईरान परमाणु वार्ता से जर्मन कंपनियों की उम्मीद

पश्चिमी देशों और ईरान के बीच ईरानी परमाणु कार्यक्रम विवाद के निपटने की संभावनाओं के साथ ही जर्मन कंपनियां एक बार फिर ईरान से रिश्ते गहराने की उम्मीद कर रहे हैं. लेकिन इस बार चीन के रूप में एक बड़ी चुनौती भी सामने होगी.

पश्चिमी देशों और ईरान के बीच परमाणु वार्ता के निर्णायक चरण में पहुंचने के साथ ही जर्मन कंपनियों मे उम्मीद की किरण जग गई है. उनका मानना है कि ईरान पर लगे प्रतिबंधों के हटने की स्थिति में वे इस संसाधन संपन्न देश के साथ फिर से अरबों का कारोबार कर पाएंगे. ईरान कभी जर्मनी के मुख्य व्यापारिक भागीदारों में से एक था. "मेड इन जर्मनी" टैग वाली चीजें आज भी ईरान में प्रतिष्ठित मानी जाती हैं. इसी वजह से जर्मन उद्योग और वाणिज्य संघ को उम्मीद है कि आने वाले समय में जर्मन कंपनियां ईरान में कम से कम दस अरब यूरो का निर्यात करेंगी.

जर्मन उद्योग और वाणिज्य संघ के विदेश व्यापार अधिकारी वोल्कर ट्रायर कहते हैं, "अतीत के प्रतिबंधों के बिना, 10 अरब यूरो का स्तर 2014 में ही छू लिया होता." इसके उलट जर्मन संघीय सांख्यिकी विभाग के आंकड़ों के अनुसार पिछले साल जर्मनी का कुल निर्यात मात्र 2.39 अरब यूरो का ही रहा. अमेरिका और यूरोपीय संघ द्वारा ईरान के साथ कारोबार पर लगाए गए प्रतिबंधों का सीधा फायदा चीन को हुआ है. आंकड़े यह हकीकत साफ बयां करते हैं. निर्यात ऋण बीमा कंपनी यूलर हेर्मेस के मुताबिक ईरानी आयात में जहां जर्मनी की हिस्सेदारी 6.3 फीसदी है वहीं चीन की हिस्सेदारी 15 फीसदी है. 2013 में चीन और संयुक्त अरब अमीरात ईरान के मुख्य सप्लायर थे.

ईरान में चीन के बढ़ते प्रभाव का अनुमान मशीनरी और संयंत्र उपकरणों के बाजार से लगाया जा सकता है. जर्मन मशीनरी उद्योग संघ के अनुसार ईरान के बाजार में उनकी हिस्सेदारी 2006 में 30 फीसदी से गिर कर 2013 में मात्र 11.7 प्रतिशत तक जा पहुंची. अब इस बाजार में चीन की 36 प्रतिशत हिस्सेदारी है. संघ के अनुसार चीन से आंशिक रूप से भी अपनी हिस्सेदारी छीनने के लिए जर्मन कम्पनियों को काफी मशक्कत करनी पड़ेगी.

एपी/एमजे (डीपीए)

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