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दुनिया

इस शर्त से रुक सकता है ट्रिपल तलाक

एक बार में तीन बार तलाक कहने से होने वाले तलाक पर बहस जारी है. लेकिन कई मुस्लिम महिलाएं भी इस बात को नहीं जानती हैं कि अगर वे चाहें तो निकाह के समय एक ऐसी शर्त रख सकती हैं, जिससे मर्द उन्हें एकतरफा तलाक नहीं दे सकेंगे.

ट्रिपल तलाक का मुद्दा फिर गरमा गया है. इस्लामिक धर्मगुरु एक बार फिर सामने हैं. एक ही बार में तीन बार तलाक कह देने से पति-पत्नी का रिश्ता समाप्त कर देने पर बहस जारी है. लेकिन कई मुस्लिम महिलाएं भी इस बात को नहीं जानती हैं कि अगर वे चाहें तो निकाह के समय एक ऐसी शर्त रख सकती हैं, जिससे मर्द उन्हें एकतरफा तलाक नहीं दे सकेंगे. ऐसा किया जाए तो भविष्य में कभी दोनों पति-पत्नी की रजामंदी के बिना तलाक नहीं हो सकेगा, चाहे वह ट्रिपल तलाक ही क्यों न हो.

मामला भारत की शीर्ष अदालत में भी पहुंचा है. ट्रिपल तलाक को बहुत सी मुस्लिम महिलाएं मर्दों के हाथ में एक ऐसे हथियार के रूप में देखती हैं, जिससे उनके ऊपर हमेशा खतरे की तलवार लटकी रहती है. कभी भी तीन बार तलाक कह कर उनको छोड़ दिया जा सकता है. लेकिन वे चाहें तो इससे बच सकती हैं.

मर्दों के तलाक देने की प्रक्रिया को मुश्किल बनाने से भी मामला हल होने वाला नहीं है. मुस्लिम सामाजिक कार्यकर्ता नीलम रहमान कहती हैं, "बात ट्रिपल तलाक की नहीं हैं. अगर मर्द के पास तलाक देने का अधिकार है तो वो तीन हो या एक तलाक, वो उसका प्रयोग करेंगे. आप कितनी शर्ते लगायेंगे. बात ये है कि औरतों को भी मर्द को तलाक देने का अधिकार जानना चाहिए, ज्यादातर मुस्लिम महिलाएं तीन तलाक के खिलाफ हैं लेकिन वो खुद के अधिकार भी नहीं जानती हैं." नीलम मुस्लिम महिलाओं को उनके तलाक देने के अधिकारों के प्रति जागरूक करने का काम कर रही हैं.

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मुस्लिम धर्मगुरु और ऐशबाग ईदगाह के इमाम मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली का मानना है कि मुस्लिम औरत भी अपने पति को बिल्कुल अपनी मर्जी से छोड़ सकती है. फरंगी महली बताते हैं, "बहुत कम महिलाएं जानती हैं कि खुद उनके पास भी मर्दों को तलाक देने का अधिकार है. बहुत कम महिलाएं इसका प्रयोग करती हैं." इस्लाम में शादी एक कॉन्ट्रैक्ट है. इसमें पति एक तयशुदा रकम मेहर के रूप में निकाह के बाद चुकाता है. दोनों पक्ष में से कोई भी जब चाहे दूसरे को छोड़ सकता है. ट्रिपल तलाक का अधिकार अगर मर्दों के पास है, तो औरतों के पास कई तरीके हैं जिनके जरिये वो निकाह खत्म कर के मर्द को छोड़ सकती हैं.

तफ्वीद--तलाक

जब मुस्लिम निकाह एक कॉन्ट्रैक्ट है जिसमें मेहर की रकम पहले तय होती है, वकील और गवाह के हस्ताक्षर होते हैं तो निकाहनामा के प्रारूप को बदला जा सकता है. ये बात पूरी तरह से इस्लाम में स्वीकार्य है. इसमें औरत ये शर्त रख सकती है कि उसे कभी एकतरफा तलाक नहीं दिया जा सकता है. दोनों पक्ष के इस पर राजी होने पर हस्ताक्षर होंगे और निकाह पूर्ण माना जायेगा. इस 'तफ्वीद-ए-तलाक' में औरत अपने अधिकार को पूरी तरह सुरक्षित कर सकती है और एकतरफा तलाक से बच सकती है. मौलाना फरंगी महली का मानना है कि इस प्रकार की शर्त रखी जा सकती है. फरंगी महली कहते हैं, "आमतौर पर भारतीय मुसलमानों पर अन्य धर्मो के बहुत से संस्कार हैं. लोग शादी के मौके पर तलाक की बात करना गलत समझते हैं. अगर औरत चाहे तो ये शर्त लगा सकती है. लेकिन इसका प्रयोग बहुत ही कम होता है."

खुला

मुस्लिम महिला भी इसमें अगर चाहे तो अपनी तरफ से अपने पति को तलाक दे सकती है. 'खुला' में तलाक की प्रक्रिया औरत द्वारा शुरू की जाती है. उसको स्थानीय दारुल क़जा (शरिया कोर्ट) में सिर्फ एक दरख्वास्त देनी होती है कि वो अपने पति से तलाक चाहती है. दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद तलाक को मंजूर कर लिया जाता है. महली बताते हैं, "आमतौर पर महिलाएं इस विकल्प का थोड़ा बहुत प्रयोग करती हैं जिसमें ज्यादातर मामले शारीरिक यातना या फिर ठीक से ख्याल ना रखने के होते हैं."

फस्ख--निकाह

इस प्रक्रिया में भी औरत खुद अपने पति को तलाक दे सकती है. उसे एक एप्लीकेशन दारुल कजा में देनी होगी और वहां के बुलावे पर अगर पति हाज़िर नहीं होता है तो भी निकाह को औरत की मंशा के अनुरूप ख़त्म कर दिया जाता है.

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