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"इस्लाम भी जर्मनी का हिस्सा"

एकीकरण के बीस साल बाद जर्मन राष्ट्रपति ने जर्मनी में इस्लाम और अप्रवास की बात छेड़ी. रोज़मर्रां की राजनीति पर इसका क्या असर पड़ सकता है, फोल्कर वागनर की समीक्षा.

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जर्मनी के राष्ट्रपति क्रिस्टियान वुल्फ ने पद संभालने पर कहा था कि वे जर्मनी में विदेशी मूल के नागरिकों को शामिल करने के मुद्दे को खास अहमियत देंगे. रविवार को जर्मन एकीकरण के बीसवीं सालगिरह पर उन्होंने इस मुद्दे को उठाया और कहा कि एक राष्ट्र अपना भविष्य तभी सुरक्षित कर सकता है जब वह दूसरी संस्कृतियों को शामिल करने के लिए तैयार रहे.

क्रिस्टियान वुल्फ ने अपना वादा निभाया. तीस मिनट के भाषण में जर्मन एकता से कहीं ज्यादा संघटन और प्रवासन के बारे में बात हुई. और एक ऐसे अवसर पर विदेशी मूल के नागरिकों के बारे में बात करना आम बात नहीं है. वक्तव्य की मुख्यबिंदु बेहद अहम है. जर्मनी में पिछले कई हफ्तों से संघटन का विरोध कर रहे लोगों पर विवाद चल रहा है.मतलब उन नागरिकों से है जो यहां रहते हैं लेकिन जर्मन नहीं सीखना चाहते, जो संविधान को नहीं मानते और सरकारी सहारे पर जीते हैं. वुल्फ ने समस्या दिखाई है, लेकिन 'मेड इन जर्मनी' कहला रहे उग्रवादियों को लेकर उभरते इंटेग्रेशन विवाद पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया. जर्मन सीखना जर्मनी में आ रहे हर प्रवासी का कर्तव्य है और जर्मन कानून हर व्यक्ति पर लागू होते हैं. अब तक इतना समझ में आता है.

लेकिन इस्लाम के बारे में उनके बयान काफी व्यापक थे, ईसाई और यहूदी धर्म जर्मनी के इतिहास और वर्तमान का हिस्सा हैं, वे कहते हैं, "लेकिन इस बीच, इस्लाम भी." अब तक इस स्तर के किसी भी नेता ने इस बात को इतनी स्पष्टता से नहीं कही है. लेकिन दूसरी तरफ जीवन में 'मृगतृष्णाओं' के बारे में उनकी बातें लोगों ने कई बार सुनी हैं. कहते हैं कि कोई साधारण व्यक्ति की नहीं बल्कि देश के प्रतिनिधि इस मृगतृष्णा में फंसे हुए हैं. इस सिलसिले में राष्ट्रपति ने जर्मनी में सांस्कृतिक विवधता की कल्पना की आलोचना की. उनके मुताबिक इस तरह की कल्पनाएं और गलतफहमियों को जन्म देती हैं और समस्याओं का हल नहीं मिलता है. उन्होंने देश में वामपंथियों को करारा झटका दिया. और कहा कि जर्मनी कई दिनों से प्रवासन का देश है, एक बात जो जर्मनी में कई मध्यवर्गीय रूढ़ीवादी नेताओं को समझ नहीं आई है.

अब बस देखने वाली बात है कि रोज़मर्रां की राजनीति किस तरह राष्ट्रपति के बयानों से निबटती है, जिसमें स्थिति को सुधारने के लिए व्यावहारिक सुझाव दिए जाएंगे. अगर अली स्कूल में जर्मन बोलता है और दिन में अपनी मां से तुर्की में बात करता है क्योंकि उसकी मां को बस तुर्की आती है, तो इससे किसी को फायदा नहीं. या फिर, जर्मनी स्कूलों में इस्लाम की पढ़ाई. लेकिन राष्ट्रपति वुल्फ कहते हैं, कृपा कर इसे जर्मन में पढ़ाएं और जर्मन शिक्षक ही इसे पढ़ाएं.

उधर जर्मन एकता और उनके पद संभालने पर वुल्फ के बयान काफी सटीक रहे. 1989 में पूर्वी जर्मनों का नारा, "वियर जिंड डास फोल्क" यानी हम एक कौम है, के उद्देश्य को उन्होंने विकसित किया. उनके मुताबिक, इसका मतलब उन सब से है, जो आज जर्मनी में रहते हैं.

जर्मन संविधान, ग्रुंडगेजेट्स के मुताबिक राष्ट्रपति की राजनीतिक शक्ति काफी कम है. लेकिन उनके पास उनके शब्दों की ताकत है, लेकिन बहुत ज़्यादा भी नहीं. उनके दफ्तर का काम है, गणतंत्र के आध्यात्मिक माहौल को प्रभावित करना. वुल्फ का पहला भाषण भी उतना ही अहम है. जर्मन एकीकरण के बीस साल के अवसर पर इस बयान से उन्हें और उनके संदेश को निश्चित रूप से और सावधानी से सुना गया. हो सकता है इसका कुछ प्रभाव भी पड़े. प्रवासियों के संघटन को संबोधित करते हुए उन्होंने इस मौके का फायदा उठाया है ताकि राजनीति की दिशा को एक तरह से प्रभावित किया जा सके.

रिपोर्टः फोल्कर वागेनर/एमजी

संपादनः ओ सिंह

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