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दुनिया

इस्लाम के खिलाफ जंग एक भद्दा झूठ: ओबामा

आतंकवाद और कट्टरपंथ से जूझने के लिए अमेरिका में तीन दिनों तक सम्मेलन चला जिसमें दुनिया भर से 60 देशों के प्रतिनिधि जमा हुए. अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा कि आतंकवादी एक अरब मुसलामानों की आवाज नहीं हैं.

इस सम्मेलन में ओबामा के भाषण की खूब चर्चा हो रही है. लेकिन साथ ही कई विशेषज्ञ यह भी कह रहे हैं कि सम्मेलन में बातें ज्यादा और काम कम हुआ. ओबामा ने इस्लाम और आतंकवाद के बीच फर्क तो बताया लेकिन आतंकवाद से जूझने के लिए कोई ठोस कदम तय नहीं हुए. अपने भाषण में ओबामा ने कहा, "यह धारणा कि पश्चिम इस्लाम के खिलाफ जंग लड़ रहा है, एक भद्दा झूठ है. और हम किसी भी धर्म से नाता रखते हों, हम सब की जिम्मेदारी बनती है कि इस धारणा को खारिज कर दें."

नागरिकों के साथ साथ ओबामा ने धर्म के प्रचारकों से भी यह जिम्मेदारी पूरी करने की अपील की. उन्होंने कहा, "मुस्लिम समाज के बुद्धिजीवियों और धार्मिक नेताओं की भी जिम्मेदारी बनती है कि ना सिर्फ वे इस्लाम की गलत व्याख्या के खिलाफ आवाज उठाएं, बल्कि इस झूठ को भी खारिज करें कि हम सभ्यताओं की जंग में पड़े हैं."

अफ्रीका और मध्य पूर्व में इस्लामिक स्टेट और बोको हराम जैसे आतंकी संगठनों का प्रहार इस सम्मलेन के केंद्र में रहा. साथ ही हाल के महीनों में यूरोप में हुए हमलों पर भी चर्चा हुई. कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून ने कहा कि वे आने वाले महीनों में धार्मिक नेताओं का एक सम्मेलन आयोजित कराएंगे, जिसमें अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और शांति पर चर्चा होगी. बान की मून ने कहा, "खतरे से निपटने के लिए सैन्य कार्रवाई जरूरी है लेकिन गोली कोई जादू नहीं कर सकती. मिसाइल शायद आतंकवादियों को खत्म कर सकें लेकिन अच्छी शासन प्रणाली उन्हें यकीनन खत्म कर देगी."

इस मौके पर ओबामा ने संयुक्त अरब अमीरात के साथ मिल कर एक नया डिजिटल कम्युनिकेशन हब बनाने की भी बात की, जिसके तहत धार्मिक नेताओं के साथ मिल कर आतंकी मुहीम के खिलाफ प्रचार किया जाएगा. ओबामा ने कहा कि हिंसा फैलाने वालों का कोई धर्म नहीं होता, आतंकवादी और कट्टरपंथी दुनिया भर के एक अरब मुसलमानों का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं. उन्होंने सभी देशों से शांति की प्रक्रिया को मजबूत करने की अपील की.

विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले कुछ सालों में पश्चिमी देशों से 20,000 से भी ज्यादा लोग अपने देश छोड़ जिहाद के नाम पर आतंकी गुटों से जा मिले हैं. इनमें से 4,000 पिछले दो साल में पश्चिमी यूरोप से सीरिया और इराक जैसे देशों में गए हैं.

आईबी/आरआर (रॉयटर्स, एएफपी, डीपीए)

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