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दुनिया

इस्राएल पर जर्मनी का रुख नहीं बदला

इस हफ्ते जब इस्राएली प्रधानमंत्री बेन्यामिन नेतन्याहू के साथ जर्मन चांसलर अंगेला मैर्केल की मुलाकात हुई तो माहौल खुशनुमा नहीं था. हालांकि जर्मन- इस्राएली रिश्तों के जानकार मानते हैं कि बेरुखी के बावजूद मजबूती कम न होगी.

मिषाएल मेर्टेस जर्मन थिंक टैंक कोनराड ऑडेनावर स्टिफटूंग के येरुशलम दफ्तर के प्रमुख रहे हैं. यह थिंक टैंक चांसलर अंगेला मैर्केल की क्रिस्टियान डेमोक्रैटिक यूनियन पार्टी के साथ 2011 से काम कर रही है. इससे पहले वह जर्मन राज्य नॉर्थराइन वेस्टफालिया के संघीय, यूरोपीय और अंतरराष्ट्रीय मामलों के राज्य सचिव की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं. इसके अलावा 1984 से 1998 के बीच वह चांसलर हेल्मुट कोल के साथ संघीय सरकार में भी काम कर चुके हैं. नेतन्याहू के दौरे के बाद डॉयचे वेले ने मेर्टेस से इस्राएल के मुद्दों पर बातचीत की.

डीडब्ल्यूः पिछले हफ्ते संयुक्त राष्ट्र में फलीस्तीन को पर्यवेक्षक बनाने पर वोटिंग के दौरान जर्मनी के बाहर रहने से इस्राएल कितना दुखी हुआ?

मिषाएल मर्टेसः मुझे नहीं लगता कि आप यह कह सकते है कि इस्राएल दुखी है. निश्चित रूप से नेतन्याहू सरकार दुखी है लेकिन वहां पूर्व प्रधानमंत्री एहुद ओल्मर्ट जैसे लोग भी हैं जो संयुक्त राष्ट्र के फैसले पर सकारात्मक ढंग से बोल रहे हैं. मैं कई लोगों को जानता हूं और उनमें से ज्यादा मध्य वामपंथी हैं जो इसके विरोध मे नहीं है बल्कि कई तो इसके पक्ष में हैं. नेतन्याहू का दुख इस वजह से हैं क्योंकि इस्राएली सरकार ने जर्मन सरकार की उन चेतावनियों और संकेतों को गंभीरता से नहीं लिया जिनमें उससे बस्तियां बनाने की नीति पर कुछ करने के लिए कहा गया. इन चेतावनियों पर ध्यान ही नहीं दिया गया. जर्मन पक्ष को कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली. मुझे लगता है कि इस्राएली सरकार ने जर्मन सरकार के जवाब नहीं देने के असर को कम करके आंका.

दूसरी बात यह है कि जर्मनी दो राष्ट्र सिद्धांत वाले हल के बहुत पक्ष में है. अगले साल ओस्लो समझौते के 20 साल पूरे हो रहे हैं जिसमें इस्राएलियों और फलीस्तीनियों के लिए दो राष्ट्र सिद्धांत का लक्ष्य रखा गया था. हम इस हल से अब भी बहुत दूर हैं. मैं समझता हूं कि संघीय सरकार ने अपनी स्थिति के जरिए इस्राएली पक्ष की बस्तिया बसाने की नीति पर अपनी चिंता जता दी है जो दो राष्ट्र के हल को लागू करना मुश्किल बना रहा है.

कौन से मुद्दे हैं जो दांव पर लगे हैं?

आपको निश्चित रूप से इस्राएल की सुरक्षा पर जर्मनी के रुख और छोटे समय के लिए राजनीतिक असहमतियों के बीच फर्क करना होगा. जहां तक इस्राएल की सुरक्षा का मसला है, जर्मनी सौ फीसदी अपने रुख पर कायम है, आप ही देखिए इस्राएल को पनडुब्बियां दी गईं, गजा से दागे गए रॉकेटों से बचाव पर, इस्रायल के अपनी सुरक्षा के अधिकार पर मैर्केल का रुख देखिये.

हाल के विवाद को ज्यादा तूल देने के मैं एकदम खिलाफ हूं. इससे इस्राएल की सुरक्षा के मामले में जर्मनी के बुनियादी रुख में कोई बदलाव नहीं आया है. हालांकि मैं बस्तियां बसाने की नीति पर जर्मन सरकार की चिंता समझ सकता हूं जिसने दो राष्ट्रों के फॉर्मूले को असंभव बना दिया है. मैर्केल यह साफ साफ कह चुकी हैं.

वास्तव में अगर कुछ बदल रहा है तो वह जर्मनी के लोगों का रुख है. यह लोगों की राय जानने के लिए किए सर्वे से साफ हो गया है. अगर आप जर्मनी के राजनीतिक वर्ग की ओर देखें तो साफ है कि वहां इस्राएल के लिए मजबूत समर्थन है और मुझे इसमें कोई बदलाव नहीं दिख रहा. अगर आप लोगों के रुख पर मोटे तौर पर देखें तो उनक रवैया इस्राएल को लेकर थोड़ा बदल रहा है. लोग इस्राएल की आलोचना कर रहे हैं.

पहले बातचीत बंद दरवाजों के पीछे होती थी. अब संवाद का नया तरीका आ गया है जहां आप जर्मनी और इस्राएल के बीच सार्वजनिक रूप से बात होती है. पहले कभी इस तरह से एक दूसरे को अपनी निराशा बताई गई हो, ऐसा मुझे याद नहीं है.

यूरोप में जर्मनी इस्राएल का सबसे अच्छा दोस्त है. अगर जर्मनी इस्राएल से निराश हो रहा है और संयुक्त राष्ट्र में वोटिंग से बाहर हो रहा है तो फिर बाकी यूरोपीय देशों के लिए क्या कहा जाए?

ब्रिटेन, फ्रांस या स्वीडन की प्रतिक्रिया से अगर जर्मन प्रतिक्रिया की तुलना की जाए तो यह बहुत संभली हुई प्रतिक्रिया थी. जर्मनी अब भी बाकी यूरोप की तुलना में इस्राएल का ज्यादा पक्षधर है. यूरोपीय संघ के सामने चुनौती अब यह है कि उसे मध्यपूर्व पर एक साझा रुख अपनाना होगा और अब तक जो हमने देखा है उसमें यूरोपीय देशों के रुख में बड़ा भारी अंतर दिख रहा है. जर्मनी यूरोप के स्तर पर बोलते वक्त हमेशा बेहद सहयोगी रहा है इसलिए यह मुमकिन है कि वह यूरोपीय राजनीति को प्रभावित करने की कोशिश करे कि संयुक्त प्रतिक्रिया न केवल इस्राएल बल्कि फलीस्तीन और मध्यपूर्व के दूसरे हिस्सों पर भी हो.

क्या यह संकट है?

यह संकट नहीं है बल्कि यह दिखाता है कि जिम्मेदार लोग सिर्फ जर्मनी में ही नहीं अमेरिकी में भी हैं. अगर आप हिलेरी क्लिंटन का बयान देखें तो समझ में आ जाएगा कि वो इस बात से बहुत चिंता में हैं कि शायद दो राष्ट्र हल के लिए अब शायद एक ही मौका बचा है. ओस्लो की 20वीं बरसी अगले साल है और इस्रायल और फलीस्तीन में उन लोगों की तादाद बढ़ रही है जो मानने लगे हैं कि यह समझौता नाकाम हो गया.

मेरा ख्याल है कि पश्चिमी देशों में इस बात को लेकर बेचैनी है कि दो राष्ट्र हल को अगर जल्दी ही लागू नहीं किया गया तो शायद भविष्य में इसे लागू कर पाना असंभव हो जाएगा.

क्या यही बात लोग सालों से नहीं कह रहे?

इस्राएल में रहने वाले मेरे एक दोस्त ने मुझे एक बार बताया कि वह अक्सर कहा करता था दोपहर में पांच मिनट बचे हैं. मुझे पूरी यकीन है कि दोपहर के बाद पांच मिनट नहीं बीते हैं.

इंटरव्यू: डानियाला चेसलो

संपादन: निखिल रंजन

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