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विज्ञान

इलाज के लिए अब डॉक्टर ऊंट

रेगिस्तान के जहाज ऊंट के बारे में हम सब जानते हैं लेकिन अब ऊंट बीमारियों को ठीक करने में लगा है. ब्रेन स्ट्रोक हों या किसी और बीमारी के कारण लकवे के शिकार मरीजों को मदद कर रहे हैं जर्मनी में ऊंट.

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ऊंट पर चढ़ो और स्वस्थ हो जाओ

ऊंट बहुत ही शांत जानवर हैं, उन्हें देखकर और उनके साथ काम करने से आपके अंदर भी शांति समा जाती है - यह मानना है जाकलीन मजुमदार का जो जर्मनी की राजधानी बर्लिन के करीब ही रहती हैं. 35 साल की जाकलीन पेशे से फिजियोथेरेपिस्ट हैं. बंगाली मूल की जाकलीन ने घोड़ों के साथ बहुत काम किया है उनके पास भी एक घोड़ा है.

ऊंट पर इलाज

इत्तेफाक से उन्हें कुछ महीने पहले एक खयाल आया. जिस तरह से डॉल्फिन या घोड़ों के साथ खेल कर विकलांग लोगों के अंगों को हिलाने डुलाने के काबिल बनाया जाता है, क्या उसी तरह इस काम में ऊंटों को भी इस्तेमाल किया जा सकता है?

Therapeutisches Kamelreiten in Berlin

रोगी को पुचकारता ऊंट

जाकलीन बताती हैं, "जब मरीज ऊंट पर सवार होता है, तब ऊंट के चलने के विशेष ढंग की वजह से पूरा शरीर हरकत में आ जाता है. यह स्ट्रोक से पीडित मरीज़ों के लिए बहुत ही अच्छा है. इसके अलावा ऊंट बहुत ही धीरे चलता है. मरीज़ों के लिए ऊंट का शरीर सुरक्षा और विश्वास का स्रोत है क्योंकि मरीज दोनों कुबड़ों के बीच सुरक्षित है. यानी गिर नहीं सकता है."

ऊंट से प्रेम

जाकलीन मजुमदर कहती हैं कि जब उन्होंने पहली बार ऊंट को करीब से देखा, तो उन्हें प्यार सा हो गया. ऊंट की बड़ी आंखें और लंबी पलकें उन्हे बहुत खूबसूरत लगीं. ऊंट का कद 2.30 मीटर तक हो सकता है. और जर्मनी में ये लोगों को अकसर बहुत ही अजीबोगरीब जानवर लगते हैं. इसलिए कई मरीज़ तो डर ही जाते थे.

Therapeutisches Kamelreiten in Berlin

पहले तो ऊंट से सामना और फिर उस पर चढ़ना, बिल्कुल आसान नहीं है. इस डर को किस तरह दूर किया जा सकता है, जाकलीन मजुमदर बताती हैं, "अब तक मैंने यह महसूस किया है कि जो भी मरीज़ ऊंट के सामने खड़ा होता है या उसके पास आता है, उसे कुछ क्षणों के लिए कुछ नहीं समझ में आता है. शायद इसलिए क्योंकि ऊंट बहुत बड़े जानवर होते हैं. लेकिन फिर हम ऊंट से कहते हैं कि वह अपना सिर झुकाए, और मरीज़ के साथ संपर्क में आए. तब एक पल के अंदर ही सारा डर दूर हो जाता है. मरीज ऊंट के कोमल शरीर को छूता है. इसके साथ मुझे ऐसा लगता है कि वह उसकी आत्मा को छू लेता है. मेरे कई मरीज़ ऐसे थे जो इस अनुभव के बाद रोने लगे या बहुत खुश हो गए."

शरीर पर नियंत्रण

ऊंट पर सवार होने से पहले जाकलीन मजुमदार कोशिश करती है कि मरीज ऊंट की साफ सफाई में और उसके रकाब कसने में मदद करे. इससे भी मरीज और जानवर के बीच दूरी कम होती है. इसके बाद मरीजों की क्षमता के मुताबिक वह करीब 40 मिनट तक ऊंट पर सवार होते हैं. जैसा कि घोड़ों पर सवार होने के साथ देखा गया है, मरीजों की शरीर को संतुलित रखने की क्षमता बढ़ती है. साथ ही उनके अंदर विश्वास जगता है कि वह भी कुछ कर सकते हैं और उनमें हिम्मत बढ़ती है. दिमाग चुस्त दुरुस्त होता है. मांसपेशियां मजबूत रहती है, जो लकवे से पीड़ित मरीजों में अकसर ट्रेनिंग न होने से कमज़ोर हो जाती हैं. साथ ही कई मरीज़ों की लकवे की वजह से बहुत ही सख्त हुईं मांसपेशियां कोमल हो जाती हैं. मरीज़ अपनी सभी स्नायु ग्रंथियों का इस्तेमाल करता है. अकसर यह भी देखा गया है कि कई मरीज़ अपनी बीमारी की वजह से डिप्रेशन में आ गए. जाकलीन मजुमदार बताती हैं कि अब तक उनके सभी मरीज़ों में उन्होने देखा कि वह बिल्कुल उदास नहीं बल्कि खुश और दोबारा ऊंट पर चढ़ने के लिए उत्सुक थे, "हम रकाब के साथ एक खास किस्म की जीन का भी इस्तेमाल करते हैं, गर्मी के मौसम में पैर नंगे रहते हैं. जब लोग ऊंट पर सवार होते हैं, तो दिमाग बहुत चौकस रहता है. फिर मैं पैर के तलवे से लेकर, घुटनों, पेट, कंधों, गले और सिर के हिस्सों को भी चुस्त दुरुस्त कर सकती हूं. साथ ही कूबड़ों के बीच बैठने से एक स्वाभाविक मुद्रा बनती है, जिससे पेट और पीठ की मांसपेशियां मजबूत होती हैं. और चढ़ते व उतरते समय दो मजबूत धक्के लगते हैं, जिसका स्थायी रूप से असर पड़ता है."

ऊंट पर सवारी की यह थेरेपी बहुत ही अनोखी पहल है और इसीसिए जर्मन मीडिया में इसकी धूम मची है. जाकलीन मजुमदार इसकी सफलता देखते हुए दूसरे डॉक्टरों को इसके बारे में बताना चाहती हैं. अब तक मरीज़ को इसके लिए 180 यूरो यानी करीब 10 000 रुपये का खर्च खुद उठाना होता है.

रिपोर्टः प्रिया एसेलबॉर्न

संपादनः आभा एम

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