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दुनिया

इराक यानि विवाद का गढ़

अमेरिकियों के इराक छोड़ने के बाद सिर्फ ढाई साल में ऐसा क्या हो गया कि इराक चरमरा गया. यह संकट यूं ही नहीं आया, बल्कि इसका लंबा इतिहास है, जो आज कट्टरपंथी आइसिस के उदय के तौर पर सामने दिख रहा है.

इसी दौरान शिया सुन्नी झगड़ा भी चरम पर आया. इराक पर अमेरिका के हमले के बाद के घटनाक्रमों को एक बार फिर से देखा जा सकता है.

2003: अमेरिकी नेतृत्व वाली पश्चिमी सेनाओं ने इराक पर हमला बोला और उस वक्त के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन का तख्ता पलट दिया. सुन्नी सद्दाम ने लगभग दो दशक तक इराक को अपने नियंत्रण में रखा था. इस दौरान वह सुन्नियों का समर्थन कर रहे थे और शियाओं और कुर्दों को किनारा किया हुआ था. सद्दाम के तख्ता पलट के बाद इराक में शिया सुन्नी संघर्ष तेज हो गया और 2006 में यह अपने चरम पर पहुंच गया. उसके बाद अमेरिका को अतिरिक्त सुरक्षा बलों को तैनात करना पड़ा.

2011: इराक से अमेरिकी सेना के हटने के बाद वहां संघर्ष की आशंका फिर तेज हो गई. अमेरिकियों ने प्रधानमंत्री नूरी अल मालिकी से अपील की कि वह शिया, सुन्नी और कुर्दों की मिली जुली सरकार बनाएं. लेकिन इससे फायदा नहीं हुआ. सुन्नियों ने आरोप लगाया कि उन्हें दरकिनार किया गया है. उधर, उत्तरी इराक में कुर्दों ने अपना गढ़ मजबूत करने पर ध्यान लगा दिया.

2013: इराक में स्थिति अचानक बेहद खराब हो गई. सुन्नी प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतर आए. अल कायदा के समर्थन वाले आतंकवादियों ने अपने हमले तेज कर दिए. सीरिया में लड़ते लड़ते वे सीमा पार कर इराक में घुस आए.

Irak Bagdad

आईएसआईएल यानि इस्लामी स्टेट ऑफ इराक एंड लेवांट

कौन हैं ये आतंकी

आईएसआईएल, आईएसआईएस या आइसिस नाम से चल रहा संघर्ष अमेरिकियों के लिए नया है. आईएसआईएल यानि इस्लामी स्टेट ऑफ इराक एंड लेवांट, जो सुन्नी संस्था है. पहले इसका नाम अल कायदा इन इराक था.

इराक युद्ध के दौरान शिया और सुन्नी संघर्ष में यह गुट खास तौर पर उभरा. इसके बाद इराक के बंटवारे तक का खतरा पैदा हो गया. अमेरिका ने 2004 में अल कायदा इन इराक को एक आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया. इस ग्रुप ने 2006 में समारा में शियाओं के प्रमुख अल असकारी मस्जिद को उड़ा दिया. बाद में इसने क्रूर वीडियो भी जारी करने शुरू कर दिए.

पिछले साल यह ग्रुप अचानक सीरिया में पसर गया, जो वहां लड़ रहे विद्रोहियों के खिलाफ और उनके साथ संघर्ष में शामिल हो गया. इससे सीरिया में अजीब सी स्थिति पैदा हो गई. अरबी भाषा से अनुवाद करने पर इस संगठन का नाम इस्लामी स्टेट ऑफ इराक एंड ग्रेटर सीरिया होता है. यह इराक और लेवांट (तुर्की से मिस्र तक का हिस्सा) में शरीया लागू करना चाहता है.

सीरिया से रिश्ता

जिस वक्त अमेरिका इराक में अपनी सैनिक गतिविधि समाप्त कर रहा था, अरब देशों में अशांति शुरू हो चुकी थी. ट्यूनीशिया, मिस्र, लीबिया और यमन में संकट था. सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल असद की वजह से गृह युद्ध के हालात बन रहे थे. यह संगठन सुन्नियों का है और सीरिया में ज्यादातर विद्रोही सुन्नी थे, जिन्हें इनका समर्थन मिल गया. वे लड़ाई में शामिल हो गए और युद्ध को नया विस्तार दे दिया.

नए लोगों की भर्ती के साथ बहुत से विदेशी लड़ाके भी असद के खिलाफ युद्ध में शामिल हो गए. इराक और सीरिया के कुछ हिस्सों पर कब्जे के बाद इसका असर तेज होता गया. अमेरिकी खुफिया विभाग को अंदेशा है कि इस जमीन का इस्तेमाल आतंकियों की ट्रेनिंग के लिए हो सकता है. अमेरिका सीरिया में भी सत्ता परिवर्तन चाहता है लेकिन इस घटनाक्रम के बाद उसकी प्राथमिकता बदलती नजर आ रही है.

क्या बगदाद टूटेगा

क्या यह संगठन इतना बड़ा है कि मोसूल जैसे शहर पर आसानी से कब्जा कर सकता है. मोसूल इराक का दूसरा सबसे बड़ा शहर है. दरअसल उसे स्थानीय लोगों का समर्थन हासिल है. इराक के कई सुन्नी लोग मालिकी सरकार की बजाय इन दहशतगर्दों का समर्थन कर रही है.

इसके अलावा इराकी सेना भ्रष्टाचार में लिप्त है. सुन्नी और कुर्द इराक के प्रति बहुत वफादार नहीं रह गए हैं. वे अपने ही लोगों को मारने काटने की बात करते हैं. जब आइसिस के लड़ाके मोसूल में घुसे तो 75000 पुलिस और सैनिक जवान कुछ नहीं कर पाए. उन्हें सद्दाम हुसैन की पूर्व बाथ पार्टी का भी समर्थन हासिल है. सद्दाम के गृहनगर तिकरीत में वे बिना किसी प्रतिरोध के घुस गए.

लेकिन इसके बावजूद उनमें इतनी शक्ति नहीं दिखती कि वे बगदाद को हिला पाएं, जहां 70 लाख लोग रहते हैं. पर खतरा इस बात का है कि उनकी वजह से इलाके में सुन्नी विद्रोह शुरू हो सकता है, जो बहुत खूनखराबे वाला साबित होगा.

एजेए/एमजे (एपी)

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