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विज्ञान

इबोला की प्रायोगिक दवाओं पर बहस

बढ़ते इबोला संक्रमण के मद्देनजर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अगले हफ्ते इबोला की उन दवाइओं पर बहस का वादा किया है जिन्हें अभी तक एक बार भी इंसानों पर टेस्ट नहीं किया गया है. उधर नाइजीरिया में भी इबोला से दो लोगों की मौत.

इबोला से सबसे ज्यादा पीड़ित इलाकों में वैसे भी विदेशी चिकित्सा कर्मचारियों के प्रति गहरा अविश्वास है. हालांकि नाइजीरिया के स्वास्थ्य मंत्री ओनिनबुची चुकुलो ने रिपोर्टरों को बताया कि उन्होंने अमेरिका से अनुरोध किया है कि वह प्रायोगिक इबोला थेरेपी का इस्तेमाल करने की अनुमती दें. उधर अमेरिकी दवा कंपनियों से सरकार भी सवाल कर रही है कि सप्लाई पर फैसला होने की स्थिति में क्या वह दवा भेज सकते हैं. प्रोफेक्टस दवा कंपनी के मुख्य विज्ञान अधिकारी जॉन एल्ड्रिज ने कहा, "सालों से हम सरकार को कह रहे हैं कि वो थोड़ा सा निवेश इसमें करें. और अब वह पूछ रहे हैं कि हम कितनी जल्दी इसको बना सकते हैं."

बंदरों पर टेस्ट

इससे पहले एक संवाददाता सम्मेलन में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा कि मैप की दवा के बारे में उन्हें बहुत कम जानकारी है और इसलिए अभी उसे हरी झंडी नहीं दी जा सकती. और पहली कोशिश के तहत बीमारी को फैलने से बचाने के उपाय किए जाएंगे. उन्होंने कहा, "हम विज्ञान से मार्गदर्शन लेंगे लेकिन अभी हमारे पास पूरी जानकारी नहीं है. हम फिलहाल सार्वजनिक स्वास्थ्य पर ध्यान दे रहे हैं. लेकिन हम इन दवाओं के बारे में भी जानकारी लेते रहेंगे कि इन दवाओं में क्या प्रगति हो रही है."

मैप बायोफार्मासूटिकल कंपनी ने एक दशक पहले इबोला की वैक्सीन पर काम शुरू किया था. इसकी बनाई गई दवा मोनोक्लोनल एंटीबॉडी का मिक्स है. इसमें ऐसे प्रोटीन हैं जो सीधे इबोला वायरस पर असर करते हैं और इन प्रोटीन्स को बायोइंजीनियरिंग से बनाए गए तंबाकू के पौधे से निकाला जाता है. पिछले साल इस वैक्सीन का इबोला से संक्रमित बंदरों पर परीक्षण किया गया. इस दवा वाली ड्रिप के लगने के 104 से 120 घंटे के अंदर बंदर 45 फीसदी ठीक हुए. इसी तरह टेकमिरा नाम की कंपनी भी इबोला की दवा पर काम कर रही है. इसका इंजेक्शन आरएनए इंटरफेरेंस नाम की जेनेटिक तकनीक पर आधारित है. और प्रोफेक्टस बायोसाइंसेस ने भी इबोला की वैक्सीन का बंदरों पर टेस्ट किया जिसका नतीजा काफी अच्छा था.

पारंपरिक नीम हकीम

आपात स्थिति से जूझ रहे लाइबेरिया में सामान्य स्वास्थ्य सुविधाओं की हालत खराब है तो इबोला के संक्रमण का पता लगाना वहां के स्वास्थ्य अधिकारियों के बड़ी चुनौती है. इतना ही नहीं वहां के लोग बीमार होने पर हकीम के पास जाना ज्यादा पसंद करते हैं. क्योंकि ये दवाएं पत्तियों या जड़ों के रस से बनाई जाती हैं. लोगान शहर में कई लोग इस पर विश्वास करते हैं. डॉक्टर पीस बेलो ऐसे ही एक चिकित्सक हैं. उनके बोर्ड पर लिखा हुआ है कि यौन संबंधों से होने वाली बीमारी से लेकर बुरे सपनों तक को वो ठीक कर सकते हैं. वह बताते हैं, "पारंपरिक दवा, जिससे मैं इलाज करता हूं वो जड़ों से बनी है. मेरे पास कोई इबोला का मरीज नहीं है और मेरे पास उसका इलाज करने के लिए कोई दवाई भी नहीं." एक अन्य हकीम एलिजाबेथ वोबे इबोला के खतरे को जानती हैं और उनके पास भी इस बीमारी वाला कोई मरीज नहीं आया. वह कहती हैं कि अगर कोई ऐसा मरीज आया तो वह उसे लौटा देंगी और सलाह देंगी, "मैं उसे ऐसा करने से रोकूंगी. क्योंकि उन्होंने इसका कोई परीक्षण नहीं किया है, जानवरों पर भी नहीं. इसे इंसानों पर ट्राई करना सही नहीं है."

रिपोर्टः युलियुस कानुबाह/आभा मोंढे

संपादनः ए जमाल

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