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दुनिया

इबोला की दवा ढूंढने में लगी दुनिया

विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार इबोला के कारण 5,000 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है. लेकिन अब तक सही दवा नहीं मिल पाई है. इबोला की दवाएं विकास के अलग अलग स्तर पर हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार बहुत कम ही दवाएं मौजूद हैं जिन्हें इंसानों पर टेस्ट किया जा सके. डब्ल्यूएचओ के सामने 120 से ज्यादा दवाओं के प्रस्ताव रखे जा चुके हैं. लेकिन संगठन का कहना है कि इनमें से मुट्ठी भर ही इंसानों पर परखी जा सकती हैं. अधिकतर दवाएं या तो अब तक बन कर तैयार ही नहीं हुई हैं, या फिर इंसानों पर जांचे जाने के लायक नहीं हैं.

पत्रकारों से बात करते हुए डब्ल्यूएचओ के मार्टिन फ्रीडे ने बताया कि हाल ही में अफ्रीका में 18 लोगों पर टेस्ट किए गए, लेकिन नतीजों से कोई बड़ी मदद मिलती नहीं दिख रही है. उन्होंने कहा कि एक तो मरीजों को इतनी सारी तरह की दवाएं दी गयी थीं कि पता करना मुश्किल है कि किसका कितना असर हुआ और दूसरे, इन मरीजों को जितनी सुविधाएं दी गईं, वैसा पश्चिम अफ्रीका में मुहैया कराना "नामुमकिन ना सही पर बहुत ही मुश्किल है." सुविधाओं की बात करते हुए उन्होंने यह भी कहा कि टेस्ट कहां किए जाएं, यह भी एक बड़ी चुनौती है क्योंकि टेस्ट करने वाली जगह पर सुरक्षा के कड़े बंदोबस्त जरूरी हैं.

इबोला पर नजर रख रही संस्था 'डॉक्टर्स विदाउट बॉर्डर्स' ने हाल ही में कहा कि वह दो एंटीवायरल दवाओं की टेस्टिंग शुरू करना चाहती है और इस काम के लिए इबोला पीड़ितों के खून के नमूनों का इस्तेमाल करना चाहती है. इससे पहले एक डॉक्टर ने एचआईवी संक्रमित मरीजों को दी जाने वाली दवा के इस्तेमाल की बात कही थी. लेकिन डब्ल्यूएचओ ने जब दवा को टेस्ट किया तो वह इबोला वायरस के खिलाफ नाकाम रही. इसी तरह अमेरिका की जीमैप दवा भी काफी सुर्खियों में रही. दवा बनाने वाली कंपनी का दावा है कि अमेरिका पहुंचे इबोला पीड़ितों का इसी दवा से इलाज किया गया. लेकिन डब्ल्यूएचओ ने अब तक इसकी पुष्टि नहीं की है.

इबोला के कारण मारे जा चुके लोगों की संख्या 5160 हो चुकी है. इनमें अधिकतर लाइबेरिया, सिएरा लियोन, और गीनिया के मामले हैं.

आईबी/एमजे (एएफपी, रॉयटर्स)

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