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ताना बाना

इतिहास में आज: 5 मई

फ्रांस की क्रांति से निकले उस बहादुर युवक ने यूरोप की सोच बदल दी. चर्च के वर्चस्व को ढहाने और यूरोप को विज्ञान और बहुसंस्कृति की ओर मोड़ने वाले नेपोलियन ने आज ही के दिन दुनिया को अलविदा कहा.

सेना में आर्टिलेरी अफसर के पद पर तैनात होने वाले नेपोलियन बोनापार्ट का नाम आज पूरी दुनिया जानती है. लेकिन ये बात कम लोग जानते हैं कि 1769 में पैदा हुए नेपोलियन को कॉलेज में पढ़ाई के दौरान काफी परेशानियां उठानी पड़ीं. उनका परिवार मूल रूप से इटली का था. कॉलेज में नेपोलियन एक खास लहजे में फ्रांसीसी बोलते थे. उन्हें फ्रांसीसी भाषा में काफी परेशानी भी होती थी. इसके बावजूद नेपोलियन बोनापार्ट गणित और इतिहास में माहिर थे.

1785 में नेपोलियन का प्रमोशन हुआ और उन्हें सेकेंड लेफ्टिनेंट बना दिया गया. इसके बाद 1789 में फ्रांस में क्रांति हुई. बड़ी संख्या में युवा सड़कों पर उतर आए. उन्होंने "आजादी, समानता और भाईचारे" का नारा बुलंद किया. यह नारा आज भी फ्रांसिसी संस्कृति की आत्मा जैसा है. नेपोलियन बोनापार्ट क्रांति से प्रभावित हुए. उन्होंने इसका समर्थन करना शुरू कर दिया.

सत्ता के विद्रोह की सजा भुगतने के बावजूद नेपोलियन ने कुछ ही सैनिकों की एक टुकड़ी बनाई. ये वो सैनिक थे जो नेपोलियन को जान से मारने आए थे. इसके बाद पूरे यूरोप में नेपोलियन बोनापार्ट का सिक्का चला. यह बात बहुत कम लोग जानते है कि नेपोलियन ने ही दूरी नापने के लिए यूरोप में मीटर को मानक बना दिया. उन्होंने कई और मानक सेट किए. इन्हीं में मीट्रिक सिस्टम भी है. ये आज भी जारी हैं. रूस तक पहुंचने वाले नेपोलियन ने अपने इलाके में सभी चर्चों की ताकत को रौंद दिया. यूरोप को उन्होंने धार्मिक सहिष्णुता का पाठ पढ़ाया.

लेकिन 1815 में वाटरलू की लड़ाई में नेपोलियन की करारी हार हुई. मित्र सेनाओं ने नेपोलियन बोनापार्ट को बुरी तरह हरा दिया. इस लड़ाई में भारत में तैनात ब्रिटिश अफसरों की भी मदद ली गई. वाटरलू की हार के बाद नेपोलियन को सेंट हेलेना द्वीप में निर्वासित कर दिया गया. वहीं 5 मई 1821 को उनकी मौत हो गई.