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ताना बाना

इतिहास में आज: 27 मार्च

सन 1989 में इसी दिन रूस में पहली बार स्वतंत्र चुनाव हुए थे. सोवियत काल में हुए इस चुनाव के शुरुआती नतीजों से ही अंदाजा लगने लगा था कि लाखों मतदाताओं ने कम्युनिस्ट उम्मीदवारों को नकार दिया था.

चुनाव के अंतिम नतीजे भी अपेक्षा के अनुरूप ही रहे. कम्युनिस्ट पार्टी के बहुत से वरिष्ठ नेताओं को चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा. सोवियत संघ में इन संसदीय चुनावों में पहली बार नागरिकों को यह विकल्प मिला था कि वे कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं के अलावा भी किसी को वोट दे सकें.

यह चुनाव इस मायने में भी ऐतिहासिक माने जाते हैं कि यह पहला मौका था जब सोवियत संघ का विरोध करने वालों को भी जनता के सामने आने का मौका मिला. रूसी अखबार 'इजवेस्तिया' के हवाले से यह कहा गया कि इन चुनावों में ज्यादातर क्षेत्रों में करीब 80 से 85 फीसदी लोगों ने अपने वोट का इस्तेमाल किया. अखबार ने तो इन नतीजों को एक नए युग की शुरूआत कह डाला और उस नए युग को "लोकतंत्र की तानाशाही" का नाम दे डाला.

कुल 1,500 सीटों के लिए हुए चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी के बाहर के बहुत सारे उम्मीदवार चुने गए. भारी मतों के साथ बोरिस येल्तसिन ने नई सरकार बनाई. सन 1991 तक सोवियत संघ अस्तित्व में रहा. संवैधानिक रूप से तो सोवियत संघ 15 स्वशासित गणतंत्रों का संघ था लेकिन असल में पूरे देश के प्रशासन और अर्थव्यवस्था पर केन्द्रीय सरकार का कड़ा नियंत्रण था. रूस इस संघ का सबसे बड़ा गणतंत्र और राजनैतिक, संस्कृतिक और आर्थिक केंद्र था. 1989 का साल यूरोप में भी भारी उथल पुथल का साल था.

जर्मनी के पूर्वी पड़ोसी देश पोलैंड में भी जून 1989 में पहली बार स्वतंत्र चुनाव हुए. यहां जनता ने भारी बहुमत से लोकतंत्र और मुक्त बाजार वाली आर्थिक व्यवस्था को अपनाने के पक्ष में मतदान किया.

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