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ताना बाना

इतिहास में आज: 20 दिसंबर

अमेरिका में आज ही के दिन 1956 में रंग भेद के खिलाफ एफ्रो-अमेरिकी महिला रोजा पार्क्स की लड़ाई रंग लाई और सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि बसों में होने वाले रंगभेद पर रोक लगाई जानी चाहिए.

रंग-रूप, नस्ल और जाति के आधार पर किसी को कम और किसी को ज्यादा क्यों? कोई ऊंचा और कोई नीचा क्यों? नागरिक अधिकारों की लड़ाई की जननी कही जाने वाली पार्क्स ने अमेरिका में बराबरी की लड़ाई का बिगुल बजाया.

1955 में एक दिन जब वह काम से घर जाने के लिए बस में सवार हुईं तो गोरों के लिए आरक्षित शुरुआती 10 सीटें छोड़कर पीछे एक सीट पर जाकर बैठ गईं. इस बीच बाकी सीटें भी भर गईं थीं और एक श्वेत आदमी के बस में चढ़ने पर ड्राइवर ने पार्क्स से सीट छोड़ने को कहा. रोजा ने साफ इंकार कर दिया. यहीं से नागरिक अधिकारों की लड़ाई में रोजा ने कदम रख दिया. हालांकि रोजा पार्क्स को बस में हुई इस घटना के लिए दोषी करार दिया गया और उनसे 10 डॉलर का जुर्माना भी वसूला गया. ऊपर से उन्हें 4 डॉलर की कोर्ट की फीस अलग से देनी पड़ी.

रोजा ने हिम्मत नहीं हारी और नस्ली भेदभाव से जुड़े इस कानून को चुनौती दी. लगभग एक साल तक उनके साथ दूसरे अश्वेत लोगों ने भी नगर निगम की बसों का बहिष्कार कर दिया. संघर्ष रंग लाया और 1956 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि एफ्रो-अमेरिकी अश्वेत नागरिक नगर निगम के किसी भी बस में कहीं भी बैठ सकते हैं.

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