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ताना बाना

इतिहास में आज: 20 अप्रैल

विश्व के सबसे ताकतवर देश अमेरिका में घर में ही पैदा हुए कुछ सिरफिरों ने अपनी बंदूक से ना जाने कितने मासूमों का खून बहाया होगा. ऐसी ही एक घटना 20 अप्रैल 1999 की है. जब 2 लड़कों ने 13 लोगों की हत्या कर दी.

आज ही के दिन अमेरिका के राज्य कोलाराडो के कोलंबाइन हाई स्कूल में दो छात्रों ने अंधाधुंध फायरिंग कर 13 छात्रों को मौत के घाट उतार दिया था. एरिक हैरिस और डिलेन क्लेबोल्ड ने 20 अप्रैल 1999 के दिन सुबह 11.20 बजे अपने स्कूल के बाहर खड़े छात्रों पर फायरिंग शुरू कर दी. उसके बाद दोनों छात्र स्कूल के भीतर दाखिल हो गए और स्कूल परिसर में मौजूद छात्रों पर कहर बरपाने लगे. दोपहर करीब तीन बजे जब पुलिस की स्वाट टीम के अधिकारी स्कूल परिसर पहुंचे, तब तक हैरिस और क्लेबोल्ड 12 छात्रों और एक शिक्षक की हत्या कर चुके थे. दोनों की गोलीबारी में 23 और लोग जख्मी हुए थे. साथी छात्रों को मौत के घाट उतारने के बाद दोनों ने खुद को भी गोली मार ली. हैरिस और क्लेबोल्ड ने कैफेटेरिया में दो धमाके करने की योजना बनाई थी जिसके बाद छात्र बाहर की तरफ भागते और उनकी गोलियों के शिकार हो जाते. लेकिन घर में बनाया गया बम फटा नहीं और दोनों को स्कूल के भीतर जाकर इस खूनी साजिश को अंजाम देना पड़ा.

बाद में आलोचकों ने यह भी सवाल उठाए कि 'द ट्रेंचकोट माफिया' और 'गोथ्स' जैसे संगठन और गिरोह पर कड़ी निगरानी क्यों नहीं रखी जाती. हालांकि आगे की पड़ताल से यह मालूम हुआ कि हैरिस और क्लेबोल्ड दोनों में से कोई भी इन संगठनों का सदस्य नहीं था.

1999 में ही कोलंबाइन हाई स्कूल दोबारा खुल गया लेकिन उस घटना के जख्म भरे नहीं थे. हैरिस को बंदूक बेचने वाले और 100 राउंड गोली सप्लाई करने वाले मार्क मनेस को 6 साल की सजा हुई. गोलीबारी की घटना में मारे गए छात्रों के अभिभावकों के लिए अगले कुछ साल बहुत कष्ट भरे गुजरे. गोलीबारी में घायल होने के बाद लकवे के शिकार एक छात्र की मां ने बंदूक की दुकान में खुदकुशी कर ली. हालांकि इस घटना के सालों बाद अमेरिका के स्कूल और कॉलेज सुरक्षित नहीं हो पाए हैं. कई बार सनकी हमलावर आसानी से मिलने वाले हथियार की बदौलत मासूमों को अपना शिकार बनाते आए हैं. साल 2007 में एक बार फिर एक ऐसी ही घटना वर्जीनिया में घटी. वर्जीनिया के स्कूल में एक छात्र ने अंधाधुंध फायरिंग कर 32 लोगों की जान ले ली थी. हालांकि पिछले कुछ समय से अमेरिका में बंदूक संस्कृति पर लगाम लगाने की कोशिश की जा रही है. लेकिन अब तक इस पर पूरी तरह से सफलता नहीं मिल पाई है.

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