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ताना बाना

इतिहास में आज: 15 दिसंबर

नाजी तानाशाह अडोल्फ हिटलर के यहूदी नरसंहार में व्यवस्थित कत्लेआम के आयोजक आडोल्फ आइषमन को आज के दिन 1961 में मौत की सजी सुनाई गई.

आउशवित्स का यातना शिविर कैदियों को यातना देने और मारने का सबसे बड़ा और सबसे खतरनाक केंद्र था. वहां नाजियों ने अपनी हत्यारी व्यवस्था को तराशा. आडोल्फ आइषमन जर्मन राइष के सुरक्षा मुख्यालय में यहूदी मामलों के विभाग का प्रमुख था, जो कुख्यात नाजी संगठ एसएस के अधीन था. सोवियत सेना से युद्ध के अंत में आइषमन वैटिकन की मदद से भागकर अर्जेंटीना चला गया.

यह बात सामने आने के बाद कि जर्मन खुफिया सेवा को 1952 में ही नाजी युद्ध अपराधी अडोल्फ आइषमन के अर्जेंटीना में छुपे होने का पता था, सिमोन वीजेनथाल सेंटर ने युद्ध अपराधियों से जुड़े दस्तावेजों को सार्वजनिक करने की मांग की. जर्मनी के सबसे अधिक बिकने वाले दैनिक बिल्ड ने एक दस्तावेज के हवाले से खबर दी है, "एसएस कर्नल आइषमन क्लेमेंस नाम से अर्जेंटीना में रह रहा है. अर्जेंटीना में जर्मन अखबार डेअर वेग के संपादक को 'ई' के पते की जानकारी है." सीआईए द्वारा 2006 में सार्वजनिक किए गए दस्तावेजों के अनुसार जर्मनी ने इसके बारे में अमेरिकी खुफिया सेवा सीआईए को छह साल बाद जानकारी दी.

मई 1960 में इस्राएली खुफिया सेवा ने उसे खोज निकाला और उसका अपहरण कर इस्राएल ले गए. वहां आइषमन पर मुकदमा चलाया गया जिसके दौरान उसने यहूदियों की हत्या में अपनी भूमिका को कम कर बताने की कोशिश की. "मैं तत्कालीन जर्मन नेतृत्व के आदेश पर हुए यहूदियों के कत्लेआम पर अफसोस व्यक्त करता हूं और उसकी निंदा करता हूं." अपनी जिम्मेदारी को कम करते हुए उसने अदालत से कहा, "मैं मजबूत ताकतों और अकथनीय नियति के हाथों औजार भर था." लेकिन अदालत पर इसका कोई असर नहीं हुआ. उसे दोषी पाया गया और 15 दिसंबर 1961 को उसे मौत की सजा सुनाई गई. आइषमन को 1962 में फांसी दे दी गई.

क्राकाउ से 60 किलोमीटर दक्षिण पश्चिम में स्थित आउशवित्स यातना शिविर 1940 के शुरु में बना. सितंबर 1941 में शिविर के कमांडेंट रुडॉल्फ होएस ने कैदियों के मारने के लिए जहरीली गैस साइकलॉन बी के इस्तेमाल का आदेश दिया. साइकलॉन बी का इस्तेमाल डिसइंफेक्शन के लिए होता है, लेकिन उसका धुआं मिनटों में जान ले लेता है.1942 से एसएस ने पूरे यूरोप से यहूदियों को आउशवित्स भेजना शुरू किया. 1943 से यहूदियों, सिंती, रोमा और दूसरे नाजी विरोधियों की औद्योगिक हत्या शुरू हुई. कैदियों को चार गैस चैंबरों में मारा जाता था और उसके बाद बड़े शवदाहगृह में जला दिया जाता था.

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