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ताना बाना

इतिहास में आजः 17 नवंबर

17 नवंबर 1869 को दस साल के निर्माण कार्य के बाद स्वेज नहर को यातायात के लिए खोल दिया गया. यह नहर यूरोप को एशिया से जोड़ता है.

स्वेज नहर के बनने से पहले एशिया से आ रहे जहाज अफ्रीकी महाद्वीप का पूरा चक्कर लगाकर यूरोप पहुंचते थे. उस वक्त काहिरा को फ्रांस के राजदूत फेर्दिनां दे लेसेप ने मिस्र के उसमानी शाह से एक नहर बनाने की अनुमति मांगी. यह नहर मिस्र के दक्षिण में स्वेज शहर से लेकर उत्तर मिस्र में सईद बंदरगाह तक फैला है. इसके दक्षिण में इस्माइलिया शहर है. दे लेसेप को उस्मानी शाह ने नहर बनाने की अनुमति दे दी. स्वेज कनाल कंपनी को नहर खत्म करने के बाद उस पर 99 साल तक नियंत्रण करने की भी अनुमति मिली.

नहर का निर्माण 1859 में शुरू हुआ और शुरुआत में मजदूर बेलचों और कुदालियों से काम करते थे. इसके बाद यूरोप से भाप से चलने वाली भारी मशीनें लाई गईं. मजदूरों में हैजा फैलने की वजह से काम बीच बीच में रुकता रहा और नहर को पूरा करने में 10 साल लग गए. 1869 में इसकी गहराई केवल 25 फीट थी यानी करीब सात मीटर. सतह पर इसकी चौड़ाई 60 से लेकर 90 मीटर तक थी. खुलने के बाद पहले एक साल में केवल 500 जहाज नहर पार कर पाए.

1875 में ब्रिटेन ने स्वेज कनाल में शेयर खरीदे और सात ही साल बाद मिस्र पर धावा बोलकर उसे अपना उपनिवेश बना लिया. 1936 में मिस्र और ब्रिटेन के बीच समझौते के बाद मिस्र आजाद हो गया लेकिन ब्रिटेन ने नहर पर अपना नियंत्रण बनाए रखा. दूसरे विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन को नहर पर नियंत्रण छोड़ना पड़ा और 1956 में तब के राष्ट्रपति गमाल अब्दल नासेर ने कनाल का राष्ट्रीकरण किया. वे नहर के इस्तेमाल के लिए कर लागू करना चाहते थे लेकिन इस्राएल ने बदले में मिस्र पर हमला किया जिसके बाद ब्रिटेन और फ्रांस के सैनिक भी कनाल पर कब्जा करने पहुंच गए. मामला तब सुलझा जब संयुक्त राष्ट्र ने दबाव डाला.

1966 में नहर फिर बंद हो गई जब इस्राएल ने सिनाई प्रायद्वीप पर कब्जा किया. मिस्र और इस्राएल की सेना आठ साल तक स्वेज नहर के आर पार तैनात रही. फिर 1975 में मिस्र के राष्ट्रपति अनवर सादत ने स्वेज कनाल को दोबारा खोला और इस्राएल से शांति बहाल की.

आज इस नहर से हर रोज 50 जहाज यहां से गुजरते हैं. हर साल 300 टन सामान यहां से ले जाया जाता है. यह दुनिया के सबसे व्यस्त जलमार्गों में से एक है.


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