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दुनिया

इतना बीमार तो कभी नहीं पड़े थे जर्मन!

जर्मनी के लोगों को दुनिया में सबसे ज्यादा कार्यकुशल माना जाता है. कम समय में अधिकतम काम कर दिखाना उनकी खासियत रही है. लेकिन यही जर्मन लोग अब कुछ ज्यादा ही "सिक लीव" लेने लगे हैं. आखिर क्यों?

भारत में अक्सर सेहत को बहुत संजीदगी से नहीं लिया जाता. "थोड़ा बहुत" खांसी-जुकाम, सरदर्द और बुखार तो चलता है. इन्हें दफ्तर से छुट्टी लेने की वजह नहीं माना जाता. लेकिन जर्मनी में ऐसा नहीं है. "थोड़ी बहुत" खांसी जुकाम में भी आप सिक लीव ले सकते हैं. इसकी दो वजह हैं. एक तो यह कि आप बाकी कर्मचारियों की सेहत के लिए खतरा बन सकते हैं, उन्हें अपने बैक्टीरिया या वायरस से संक्रमित कर सकते हैं. और दूसरा यह कि दफ्तर को आपसे पूरा काम लेना है. थोड़ी बहुत बीमारी के साथ आप काम भी थोड़ा बहुत ही करेंगे. इसलिए घर पर रहिये और ठीक से स्वस्थ हो कर पूरी प्रोडक्टिविटी के साथ दफ्तर लौटिये.

लेकिन इतनी सहूलियत के बाद भी पिछले दो दशक में कभी इतनी बड़ी संख्या में जर्मनी के लोग बीमार नहीं पड़े, जितना कि 2016 में. साल के पहले छह महीने पर गौर करें, तो पता चलता है कि हर तीन में से एक कर्मचारी ने कम से कम एक सिक लीव जरूर ली है. औसत निकाला जाए तो 7.9 दिनों के लिए लोग काम पर नहीं आए.

जर्मनी में बीमार होने पर तीन दिन से अधिक छुट्टी लेने के लिए डॉक्टर की पर्ची दिखानी पड़ती है. इस पर्ची पर बीमारी के बारे में भी लिखा जाता है. स्वास्थ्य बीमा अनिवार्य है. ऐसे में डॉक्टर की पर्ची बीमा कंपनी के पास भी जाती है. दफ्तर और इंश्योरेंस कंपनी दोनों ही हिसाब रखती हैं कि कर्मचारी ने कितने दिन की छुट्टी ली. छह हफ्ते तक बीमार रहने पर दफ्तर तनख्वाह देता है. इसके बाद से इंश्योरेंस कंपनी से पैसा मिलता है, जो कि कुल वेतन का एक हिस्सा मात्र होता है.

किन किन कारणों से बीमार होते हैं जर्मन?

छुट्टी लेने वाले लोगों में सबसे आम रहा पीठ, घुटने, टांगों और कूल्हों का दर्द. शोध दिखाता है कि हर पांच में से एक छुट्टी अस्थि-पंजर-संबंधी बीमारियों के ही कारण ली गयी. पुरुषों में ये समस्याएं महिलाओं से ज्यादा देखी गयी हैं. इसके बाद 17 प्रतिशत के साथ दूसरे नंबर पर रहीं सांस से जुड़ी बीमारियां और 16 प्रतिशत के साथ तीसरे नंबर पर मानसिक तनाव. शोध में पता चला है कि पिछले 30 सालों में मानसिक बीमारियों के मामले तीन गुना ज्यादा हो गए हैं.

शोध करने वाले आईजीईएस रिसर्च इंस्टीट्यूट के यॉर्ग मार्शल इसके लिए दफ्तरों में इन दिनों होने वाली मल्टीटास्किंग को एक हद तक जिम्मेदार मानते हैं. मार्शल के अनुसार काम का बोझ, टार्गेट पूरे करने का तनाव और हमेशा स्मार्टफोन के जरिये दफ्तर से जुड़े रहना भी तनाव की वजह हो सकता है. पर साथ ही वे यह भी मानते हैं कि आज के जमाने में ज्यादा से ज्यादा लोग डिप्रेशन और बर्न आउट जैसी समस्याओं को समझने लगे हैं और इनसे निपटने के लिए डॉक्टरों के पास जाने लगे हैं. यह भी बढ़ती संख्या का कारण हो सकता है.

इस शोध में कंपनियों से अनुरोध किया गया है कि कर्मचारियों को तनाव से बचाया जाए और उनसे जरूरत से ज्यादा काम की उम्मीद ना की जाए ताकि आने वाले समय में उनके स्वास्थ्य पर और बुरा असर ना पड़े.

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