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मंथन

इंसान से रोबोट

बड़ी बड़ी नीली आंखें, एक प्यारी सी लाइन वाले होंठ. या फिर बिलकुल छोटा सा चार साल के बच्चे सा, हाथ पकड़ चलने वाला. यहां इंसान की नहीं रोबोट की बात हो रही है. जो बिलकुल इंसान जैसे लगते हैं.

ह्यूमैनॉयड कहे जाने वाले ये रोबोट अब भी रिसर्च का हिस्सा हैं लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो बाजार में बिक रहे हैं. उम्मीद की जा रही है कि आने वाले दस बारह साल में ये घरों और अस्पतालों में इस्तेमाल किए जा सकेंगे.

फ्रांसीसी शहर लियों में चल रही इनोरोबो प्रदर्शनी में करीब 140 कंपनियों ने अपने रोबोट पेश किए. इनोरोबो की सीईओ कैथरीन सिमोन बताती हैं, "रोबोट इंसान और मशीन के बीच का बेहतरीन माध्यम है. आज भले ही वो रिसर्च सेंटरों तक सीमित हों लेकिन जल्द ही वो हमारे घरों में होंगे. यह एक तरह से कार की तरह है, किसी समय ये भी सबको चाहिए थी. आजकल लोग ह्यूमैनॉयड रोबोट पसंद करते हैं. सभी यह सपना पूरा करना चाहते हैं."

रीम सी

स्पेन का रीम सी रोबोट असली दुनिया में उतरने को तैयार है. इंसान जितना बड़ा ये रोबोट खुद चल सकता है और 10 किलो सामान उठा सकता है. रोजमर्रा में इसका इस्तेमाल हालांकि अभी संभव नहीं. तीन लाख यूरो का रीम सी फिलहाल रिसर्च में काम आ रहा है. जबकि एक अन्य यूरोपीय रिसर्च प्रोजेक्ट के तहत एक ऐसा रोबोट बनाया गया है जो चार साल के बच्चे की तरह चीजें पकड़ता है और अगर उसके हाव भाव देखें जाएं, तो वह भी एक चार साल के बच्चे की ही तरह हैं. आई कब नाम का ये प्यारा सा रोबोट पांच से दस साल के अंदर घर के लिए परफेक्ट मदद बन सकेगा. वहीं नाओ नाम का रोबोट एकदम रेडी टू वर्क है और बाजार में खरीदा भी जा सकता है. फ्रांस का सिर्फ 60 सेंटीमीटर ऊंचा ये रोबोट पांच हजार यूरो का है और इसके करीब छह हजार नमूने इस्तेमाल में हैं.

रोबोट से डर

हालांकि दुनिया में अभी भी बहुत से लोग ऐसे हैं जिनके जहन में रोबोट की डरावनी छवि बसी हुई है और इसलिए वह अभी भी ऐसे किसी दृश्य की कल्पना नहीं करना चाहते जहां उनकी मदद के लिए रोबोट मौजूद हों. नाओ रोबोट बनाने वाली आल्देबारान कंपनी के संस्थापक ब्रूनो मैसोनिए इस पूर्वाग्रह के बारे में जानते हैं, वो कहते हैं, "अगर आप लोगों से रोबोट के बारे में बात करें, ऐसे रोबोट जो घर पर और बच्चों की मदद कर सकें, तो वे अकसर कहते हैं, पता नहीं कि घर पर मैं सचमुच ऐसा रोबोट चाहूंगा या नहीं. ये मानसिकता है. लेकिन जैसे ही वो नाओ देखते हैं, कहते हैं, अरे, कितना प्यारा है ये, ये हमें चाहिए. फिल्मों के कारण लोगों में रोबोट की छवि डरावनी बनती है."

कृत्रिम बुद्धि वाले रोबोटों पर अभी म्यूनिख के पास गार्शिंग की तकनीकी यूनवर्सिटी में शोधकर्ता काम कर रहे हैं. एक मीटर चालीस सेंटीमीटर का रोबॉय आदर्श ह्यूमैनॉयड की परिभाषा के एकदम नजदीक है. इसमें सिर्फ इंसान के चेहरे को ही नहीं, बल्कि पूरे शरीर की संरचना को कॉपी किया गया है. इसलिए रोबॉय के जोड़ों में मोटर की बजाए मांसपेशियां और फाइबर हैं. वह भावनाएं जाहिर कर सकता है और बोल भी सकता है. रोबॉय को जान बूझ कर किसी कॉमिक की तरह बनाया गया है. प्रोजेक्ट लीडर राफाएल होस्टेटलर बताते हैं, "हमने एक दो बार डिजाइन बदली, खासकर सिर की. फेसबुक वोटिंग में लोगों से भी पूछा गया कि उन्हें कौन सा चेहरा पसंद है. हमारे लिए ये सबसे अहम था क्योंकि रोबॉय का शरीर कंकाल की तरह है और इसलिए वह दोस्ताना भी नहीं लगता. लेकिन रोबॉय को हम इस रिसर्च के लिए सकारात्मक बनाना चाहते हैं." आने वाले दिनों में यह भी रोजमर्रा में इंसान की मदद करेगा और सामाजिक संगठनों में भी. होस्टेटलर के मुताबिक, "हमारे पास जब तक रोजमर्रा में रोबोट होंगे, यानी जो घर में खाना पकाने या कपड़े प्रेस करने या धोने में मदद करेंगे, तब तक एकाध दशक तो लगे ही जाएगा. इसका कारण यह है कि हम बहुत अव्यवस्थित हैं और इसकी समझ भी अभी उतनी गहरी नहीं है."

रिपोर्टः क्रिस्टिना लाउबे/ एएम

संपादनः मानसी गोपालकृष्णन