1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

खेल

इंडियन सुपर लीगः निवेश का नया मैदान

पहले क्रिकेट, फिर हॉकी, बैडमिंटन और कबड्डी के बाद अब बारी है फुटबॉल के खेल की, जो इंडियन सुपर लीग के रूप में महादेश में अवतरित हो चुका है. कॉरपोरेट जगत बहुत बड़े निवेश के साथ फुटबॉल के मैदान पर उतरा है.

इस सुपर लीग का अगर पूरा आकार देखें तो जगमगाता हुआ, अपार उत्तेजना और उत्साह में सराबोर, गूंजता और खिलखिलाता माहौल दिखता है. टीवी पर आईएसएल का लाइव उद्घाटन समारोह देखने के बाद अंदाजा लगाना आसान था कि कॉरपोरेट और कैपिटल का जमावड़ा, खेल में एक लीग की ही नहीं एक नये आर्थिक युग की शुरुआत भी कर रहा है. बिजनेस हितों की ऐसी विहंगम एकजुटता उस आयोजन में नजर आई मानो खेल का नहीं कोई बड़ा कॉरपोरेट इवेंट हो रहा हो. क्रिकेट की इंडियन प्रीमियर लीग बता चुकी है कि खेल में निवेश, भूमंडलीय आर्थिकी का एक बेहद आकर्षक पैकेज है. हल्काफुल्का नुकसान भले ही कर दे, निराश नहीं करता.

DW.COM

रिलायंस, अमेरिकी कॉरपोरेट धुरंधर आईएमजी, स्टार इंडिया और ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन के सौजन्य से सजीधजी आईएसएल ने कई कॉरपोरेट स्पॉन्सरों को आकर्षित किया है. टाइटल प्रायोजकों के रूप में हीरो और एसोसिएट प्रायोजकों के रूप में सैमसंग, पेप्सिको, हीरो, अमूल, मुत्थु ग्रुप, मारुती सुजुकी जैसे बड़े नाम शामिल हैं. फिल्म और क्रिकेट के सितारे, लीग की टीमों के मालिक या सह मालिक हैं. लीग में आठ टीमें निकाली गई हैं. हर टीम की दस साल की फ्रेंचाइजी की कीमत ढाई करोड़ डॉलर रखी गई है. यानी कुल 20 करोड़ डॉलर में टीमें खरीदी गई हैं.

स्टार इंडिया, लीग मैचों को अपने पांच क्षेत्रीय चैनलों पर दिखा रहा है. अनुमान है कि हीरो मोटोकॉर्प ने करीब 20 करोड़ रुपए हर साल के हिसाब से लीग की टाइटल स्पॉन्सरशिप खरीदी है. बड़े ब्रांडों के पास भारत में अपने संभावित ग्राहकों की तलाश के लिए खेल जैसा मुफीद मैदान भला क्या होगा. टीमों की भी टाइटल स्पॉन्सर कंपनियां बड़े मुनाफे की उम्मीद में बड़ा निवेश कर रही हैं.

जानकारों के मुताबिक फुटबॉल के प्रति जुनून बिजनेस, स्पॉन्सरशिप और खेल संभावना से सीधे जुड़ा हुआ है. इस पैशन को जिंदा रखना ही लीग के सुनहरे भविष्य की गारंटी है. जाहिर है इसी जुनून में उन खिलाड़ियों का भविष्य भी छिपा है जो सामर्थ्य के बावजूद खेल की राजनीति और प्रबंधकीय सुस्तियों में धक्के खाते रहे हैं. आईएसएल से एक बहुत बड़ी उम्मीद बांधी गई है कि देश में फुटबॉल के दिन फिरेंगें. प्रतिभाएं निखरेंगीं, खूब दर्शक जुटेंगे. देसी खिलाड़ियों को नए अवसर मिलेंगे, नए अनुभव होंगे. यानी भारतीय फुटबॉल का नया युग शुरू होगा. लेकिन एक सवाल बनता ही है कि फुटबॉल या किसी भी खेल के उत्थान के लिए क्या कॉरपोरेट जगत का ही इंतजार इस देश में रहता है, वो निवेश लायक समझेगा तो खेल खेला जाएगा. पिछले 67 साल से देश की सरकारें क्या कर रही थीं?

क्रिकेट को छोड़ दें तो अन्य खेलों में बड़ा नाम क्यों नहीं कर पाए? आज फुटबॉल लीग आई है तो कहा जा रहा है कि वो दिन दूर नहीं जब विश्व कप में भी जाएंगें लेकिन कोस्टारिका जैसे देश तो वहां पहले से हैं और पिछली दफा क्वार्टर फाइनल तक पहुंच कर धमाल भी मचा चुके हैं. आपको बता दें कि कोस्टारिका वो देश है जहां 20 फीसदी लोग गरीबी रेखा से नीचे रहते हैं और दस फीसदी लोग बेरोजगार हैं. कोस्टारिका ही क्यों, युद्धों और अंदरूनी अशांतियों से ध्वस्त और त्रस्त देशों बोस्निया-हर्जेगोविना, घाना, चिली और क्रोएशिया को लीजिए.

फिर भारत में ये हाल क्यों? अगर सब कुछ कॉरपोरेट को ही करना है तो क्या सरकार और प्रशासन की एक बहुत विशाल सेना फाइलों को इधर से उधर खिसकाने और चुनावी राजनीति में ही मगन रहने के लिए हैं.

DW.COM

संबंधित सामग्री