इंटरनेट पर बंदिशें कबूल नहीं | ब्लॉग | DW | 19.04.2015
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ब्लॉग

इंटरनेट पर बंदिशें कबूल नहीं

भारत के संदर्भ में जिस नेट न्यूट्रैलिटी या नेट निरपेक्षता शब्द का नाम हाल तक कुछ गिने-चुने लोगों को ही पता था, अब वही शब्द अचानक बहस के केंद्र में आ गया है. लोग इंटरनेट पर तमाम सेवाएं अबाध चाहते हैं.

नेट न्‍यूट्रेलिटी या इंटरनेट निरपेक्षता का मूल सिद्धांत यह है कि इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनियां या सरकार इंटरनेट पर उपलब्‍ध सभी तरह की सामग्री समान रूप मुहैया कराए और इसके लिए शुल्क भी समान हो. लेकिन भारत में कुछ कंपनियां इसके उलट करने का प्रयास कर रही हैं. इसके तहत फेसबुक ने सबसे पहले रिलायंस के साथ मिल कर इंटरनेट डॉट ओआरजी की स्थापना की. इन कंपनियों का मकसद उपभोक्ताओं की जेबें ढीली करना है. इसके तहत जो उनकी सेवा लेगा उसे कुछ सुविधाएं मुफ्त मिलेंगी और उनकी क्वालिटी भी बेहतर होगी. ऐसा नहीं करने वाले कुछ वेबसाइटों के इस्तेमाल से वंचित हो सकते हैं. यह कदम सबको नेट पर उपलब्ध तमाम सामग्री के अबाध इस्तेमाल के अधिकार से वंचित करता है.

Symbolbild Soziale Netze

टेलीकॉम ऑपरेटरों पर मनमानी का आरोप

यही वजह है कि प्रमुख मोबाइल कंपनी एयरटेल ने जब फ्लिपकार्ट से इस आशय का करार किया तो विरोध करने वालों की झड़ी लग गई. उसके बाद फ्लिपकार्ट ने मजबूरन नेट निरपेक्षता का समर्थन करते हुए एयरटेल जीरो से करार तोड़ने का एलान किया. इसके दो दिनों बाद ऑनलाइन यात्रा सेवा प्रदान करने वाली कंपनी क्लीयरट्रिप ने भी इंटरनेट डॉट ओआरजी से हटने का एलान कर दिया. इससे नेट निरपेक्षता आंदोलन को काफी बल मिला है. यह लोगों की इंटरनेट पर अबाध पहुंच की आजादी का तो मामला है ही, उनकी अभिव्यक्ति की आजादी से भी जुड़ा हुआ है. लेकिन टेलीकॉम सेवाएं मुहैया कराने वाली कंपनियां लोगों को तमाम सेवाओं के मुफ्त इस्तेमाल की लत लगाने के बाद अब उनकी एवज में उपभोक्ताओं के जेब से अतिरिक्त रकम निकालना चाहती हैं. सारा बवाल इसी मुद्दे पर है. मिसाल के तौर पर अगर आपने किसी खास कंपनी को अतिरिक्त पैसे नहीं दिए तो आप व्हाट्सएप्प और लाइव जैसी मैसेंजर सेवाओं का इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे. अतिरिक्त शुल्क नहीं चुकाने की स्थिति में संबंधित कंपनियां उस सेवा के इस्तेमाल के दौरान इंटरनेट की गति इतनी धीमी कर देंगी कि वह सेवा बेकार साबित हो.

इस शब्‍द का सबसे पहले इस्‍तेमाल कोलंबिया विश्‍वविद्यालय के प्रोफेसर टिम वू ने किया था. इसे नेटवर्क तटस्‍थता, इंटरनेट न्‍यूट्रेलिटी और नेट समानता जैसे नामों से भी जाना जाता है. मोटे तौर पर यह इंटरनेट की आजादी या बिना किसी भेदभाव के इंटरनेट तक पहुंच की आजादी का मामला है. भारत से ज्‍यादा यह मामला अमेरिका और अंतरराष्‍ट्रीय कंपनियों के लिए चर्चा का‍ विषय रहा है. लेकिन फिलहाल यह अगर भारत में बहस का सबसे बड़ा मुद्दा बना है तो इसकी कुछ ठोस वजहें हैं. अगर नेट निरपेक्षता लागू नहीं हुई तो कुछ बड़ी कंपनियां इंटरनेट सेवाएं और ओवर द टॉप कही जाने वाली अतिरिक्त सुविधाएं मुहैया कराने के मामले में एकाधिकार कायम कर लेंगी. इसका सबसे बड़ा नुकसान नए उद्यमियों को होगा.

Symbolbild Soziale Netze

इंटरनेट तक पहुंच का अधिकार

व्हाट्सएप्प जैसी सेवाओं ने पहले ही मोबाइल कंपनियों की एसएमएस सेवा को खत्म कर दिया है. अब इंटरनेट पर उसके अलावा दूसरी कई कंपनियों के मुफ्त फोन की सेवा मुहैया कराने की वजह से इन मोबाइल कंपनियों को अपना वर्चस्व टूटता नजर आ रहा है. यही वजह है कि अचानक यह मुद्दा सुर्खियों में आ गया है. हालांकि फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग का कहना है कि नेट निरपेक्षता और इंटरनेट डॉट ओआरजी एक साथ चल सकते हैं. लेकिन विशेषज्ञों को मार्क के इस दावे पर संदेह है.

इंटरनेट पर सबकी समान पहुंच सुनिश्चित करने के लिए छिड़ी बहस के बीच केंद्र सरकार ने नेट निरपेक्षता के मुद्दे पर एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया है. यह मई के दूसरे हफ्ते तक अपनी रिपोर्ट दे सकती है. दूरसंचार मंत्री रविशंकर प्रसाद का कहना है कि भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) इस मुद्दे पर गहन विचार-विमर्श कर रहा है. सरकार को उसकी रिपोर्ट का इंतजार है. नेट निरपेक्षता का मतलब समझने के बाद इसके समर्थन में आगे आने वाले खासकर युवाओं की तादाद तेजी से बढ़ रही है. उनकी मांग है कि इंटरनेट पहले की तरह सबके लिए मुक्त होना चाहिए. टेलीकॉम कंपनियों, सरकार और आम उपभोक्ताओं के बीच की इस त्रिकोणीय लड़ाई में फिलहाल उपभोक्ताओं का ही पलड़ा भारी नजर आता है. लेकिन आगे बहुत कुछ इस बात पर निर्भर है कि सरकार और ट्राई इस मुद्दे पर क्या रवैया अख्तियार करती हैं.

ब्लॉग: प्रभाकर, कोलकाता

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