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ब्लॉग

आहत देश में आपका स्वागत है!

अंग्रेजी भाषा के चर्चित लेखक और नोबेल पुरस्कार विजेता वीएस नायपॉल ने भारत को एक घायल सभ्यता कहा था. ये बात एक दशक से भी ज्यादा पुरानी है.

उस वक्त मैं इलाहाबाद में रह रहा था जिसे भारत की गंगा-जमुनी तहजीब यानि मिश्रित सभ्यता का बड़ा केन्द्र माना जाता है. आज जबकि मैं थोड़ा बड़ा हो चुका हूं और राजधानी दिल्ली का वासी हूं, मैं भारत को एक आहत आत्मा के रूप में पहचान रहा हूं.

भारत में आजकल हर किसी की आत्मा आहत है. फिर चाहे वो कोई खास समुदाय हो, धर्म हो या फिर राजनेता. खास बात ये है कि सरकार (जिसकी जिम्मेदारी हर नागरिक के प्रति होती है) भी उन्ही लोगों की सुनती है जो खुद को आहत बताते हैं, प्रदर्शन करते हैं और फिर अंजाम भुगत लेने की धमकी भी देते हैं.

अब लीजिए. भला संगीत से भी कोई आहत हो सकता है. कश्मीर की कुछ लड़कियों ने मिलकर एक बैंड बनाया, प्रगाश. लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जो लड़कियों के गाने बजाने से ही आहत महसूस करने लगे. उनका मानना है कि इससे इस्लाम का अपमान होता है. इस्लाम में संगीत हराम है, संगीत सुनने के बाद मर्द उत्तेजित हो जाते हैं, आदि-आदि. एक मौलवी साहब ने तो बकायदा इनके खिलाफ फतवा जारी कर दिया. पुलिस में रिपोर्ट दर्ज हो गई. राजनीति शुरु हो गई. चमकते-चिकने चेहरे वाले मुख्यमंत्री ने भी जिम्मेदारी से बयान जारी किया. लेकिन लड़कियों का साथ किसी ने नहीं दिया. तंग आकर उन्होंने बैंड ही भंग कर दिया. कुछ लोगों के आहत होने का परिणाम ये हुआ कि संगीत के क्षेत्र में घाटी की लड़कियों का भविष्य ही खत्म हो गया.

तुलना स्वाभाविक है. इतना आहत तो इस्लामिक गणतंत्र कहे जाने वाले ईरान के लोग भी नहीं हो रहे हैं जितना कि कश्मीर के हो गए. अयातुल्ला खोमैनी ने इस्लामी क्रांति ईरान में ही की थी लेकिन वहां भी संगीत की छूट है. लेकिन भारत…? ईरान में लड़कियों का एक बैंड है जिसका नाम है ‘गजल बैंड'. ये बैंड इन दिनों भारत आया हुआ है. इस बैंड की सदस्यों ने प्रगाश के खिलाफ हुई फतवेबाजी और राजनीति पर हताशा जाहिर की है. लेकिन कोई करे भी तो क्या. ये भावनाओं के आहत होने का मामला है जनाब!

कुछ ही दिन पहले का वाकया है. भारत के मशहूर समाज शास्त्री आशीष नंदी ने जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में इस आशय का बयान दिया कि पिछड़ा वर्ग, दलित और आदिवासी समुदाय से आने वाले नेता भ्रष्टाचार में (तुलनात्मक रूप से ज्यादा) लिप्त होते हैं. फिर क्या था पूरे समुदाय और इसके नेताओं की भावनाएं आहत हो गईं. और इतनी आहत हो गईं कि विरोध प्रदर्शन से लेकर गिरफ्तारी तक कि मांग उठने लगी. जन दबाव (वोट बैंक) के आगे हारकर राजस्थान सरकार ने नंदी के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया. सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद ही उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग सकी. उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगे सब जानते हैं. लेकिन जब खेल राजनीति का हो और भावनाएं दांव पर लगी हो तो फिर सत्य को पिछवाड़े बैठकर आंसू ही बहाने पड़ते हैं. तब भावनाएं आहत नहीं होतीं.

कमल हासन भारत के उन चुनिंदा लोगों में से हैं जिन्हें जीनियस की कैटेगरी में रखा जा सकता है. लेकिन कमल की हालिया रिलीज फिल्म ‘विश्वरूपम' से भी कुछ लोगों की भावनाएं आहत हो गईं. फिल्म पर बैन लगाने की बात होने लगी. तोड़ फोड़, प्रदर्शन तो हुआ ही. सेक्युलर दिखने की होड़ में नेता लोग बिना देखे ही फिल्म पर बैन लगाने का एलान करने लगे. वो तो अच्छा हुआ कि मामला सुलझ गया. जिनकी भावनाएं आहत हुईं उनका दावा था कि फिल्म में इस्लाम का अपमान किया गया है. और इसे तालिबानियों के धर्म के रूप में स्थापित करने की कोशिश की है. मैंने तय किया कि फिल्म देखने के बाद ही राय बनाऊंगा. हॉल से बाहर निकलने के बाद मैं थोड़ा असहज महसूस कर रहा था क्योंकि मैं आहत नहीं हुआ था.

दरअसल, फिल्म अफगानिस्तान की तबाही को बयान करती है. किस तरह 9/11 के बाद एक तरफ नाटो तो दूसरी ओर तालिबान के बीच फंसा अफगानिस्तान जख्म जख्म हो रहा है संक्षेप में यही फिल्म की कहानी है. अफीम के कारोबार से कैसे आंतक का गोला बारूद तैयार होता है ये दिखाया गया है. फिल्म का राजनीतिक पाठ जरूर बारीकी से अमेरिकी नीतियों की पैरोकारिता करता दिखता है लेकिन अमेरिका विरोध के चक्कर में तालिबान का साथ तो नहीं दिया जा सकता. लेकिन नहीं. हम तो आहत देश के नागरिक हैं जी. हम बात बात पर आहत होते हैं. दुखी होते हैं, आंसू बहाते हैं और फिर सरकार से संरक्षण मांगते हैं. इससे असली मुद्दों पर किसी का ध्यान ही नहीं जाता. सरकार आहतों की रक्षा करके खुश है. और हम आहत बनकर.

मैं तो भारत के प्रधानमंत्री, मनमोहन सिंह को सलाह देना चाहूंगा कि वो ‘अनाथालय' की तर्ज पर हर जगह ‘आहतालय' खोल दें. ये आहत होने के कुछ नए मामले थे इसलिए मैंने आपको बताया. दक्षिण पंथियों मसलन; शिवसेना, बीजेपी, आरएसएस के आहत होने की चर्चा इसलिए नहीं करेंगे क्योंकि ये अक्सर आहत होते ही रहते हैं. हां, एक कसक मुझे इस बात की जरूर है कि मैं भी आहत क्यों नहीं हो रहा हूं. या फिर मुझे भी किसी आहत समुदाय की सदस्या लेनी पड़ेगी. आप बताइएगा.

बलॉगः विश्वदीपक

(यह लेखक के निजी विचार हैं. डॉयचे वेले इनकी जिम्मेदारी नहीं लेता.)

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