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ब्लॉग

आस्था नहीं मंशा बताइये, क्या है

ज्योतिषी से मुलाकात का मामला उछला तो भारत की मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने अपने परिचित अंदाज में मीडिया को ही उल्टा फटकार दिया. लेकिन क्या वे इसे निजी कार्यक्रम कहकर दरकिनार कर सकती हैं?

स्मृति ईरानी का कहना है कि वे निजी हैसियत में वहां गई थीं और अपने निजी जीवन में वे क्या कर रही हैं, इससे मीडिया को कोई मतलब नहीं होना चाहिए क्योंकि इसका उनके कार्यक्षेत्र या दफ्तर से कोई लेना देना नहीं है.

मंत्री महोदया ने तर्क तो ठीक ही दिया, वे मनोरंजन और टीवी जगत की अदाकारा रह चुकी हैं, निजी और सार्वजनिक उपस्थिति और सेलेब्रिटी के तर्क से वे भला कैसे अंजान होंगी. लेकिन वे देश की मानव संसाधन मंत्री भी हैं. यानि उनके जिम्मे देश की शिक्षा, संस्कृति, कला, साहित्य, आचार विचार सब आता है. देश के विकास में इस मंत्रालय का अहम रोल है और इसे बनाया ही इसलिए गया था कि देश में स्वस्थ, वैज्ञानिक, प्रगतिशील और तार्किक और पढ़ी लिखी सुसंस्कृत पीढ़ियां तैयार होती रहें.

स्मृति ईरानी के पक्ष में भी तर्क सामने आए हैं कि ऐसा कौनसा पहाड़ टूट पड़ा जो वो ज्योतिषी से मिल आईं, ज्यादातर लोग जाते हैं. नामचीन साधु-महात्माओं और बाबाओं की शार्गिदी बड़े बड़े नेताओं, खिलाड़ियों और सेलेब्रिटी ने की है, करते हैं, स्मृति ईरानी ने अपनी आस्था दिखा दी तो कौन सी आफत आ गयी. स्मृति का कदम भले ही उनकी और उनके समर्थकों की नजर में स्वाभाविक हो लेकिन पेंच यह है कि डंके की चोट पर ऐसा करने के आशय क्या हैं. आप ऐसा कर क्या बताना चाहते हैं? ठीक है आस्था और विश्वास निजी मामले हैं लेकिन क्या इस बात का ढोल पीटना सही है कि आप क्या मानते हैं, आपकी आस्थाएं क्या हैं?

मंत्री का यह मामला इसलिए भी गौरतलब है क्योंकि इस समय हिंदूवादी और संघ की राजनैतिक इकाई की सरकार प्रचंड बहुमत के साथ देश में सरकार चला रही है और इधर शिक्षा, संस्कृति, इतिहास, कला और विज्ञान को लेकर जो गतिविधियां और बयान उसके नेताओं, समर्थकों और हिंदूवादी इंटेलीजेंसिया की ओर से आए हैं, वे चौंकाने वाले तो हैं ही, बड़ी चिंता में भी डालते हैं. सबसे प्रमुख चिंता तो यही है कि अतीत, आस्था और धर्म के प्रति कुछ ज्यादा ही आग्रहवाद आखिर नई पीढ़ी और देश में कितनी वैज्ञानिक चेतना और प्रगतिशीलता ला पाएगा.

और ये सब मिलकर एक और भी बड़ी चिंता का रूप धारण कर लेते हैं जब हम अपने आसपास समाज में एक भयानकता स्त्रियों, दलितों और अल्पसंख्यकों पर बढ़ रही हिंसा के रूप में देखते हैं. क्योंकि अतीत के उन्मादी प्रशस्तिगान में ले जाने वाली शक्तियां समाज में एक तय व्यवस्था भी चाहती हैं. इस तरह यह देश में बहुसंख्यकवाद के पनपने से जुड़ी चिंता भी है. आप संस्कृत पढ़ाने को लेकर अतिशय आग्रही हो जाएंगें, आप विज्ञान और तकनीक के आविष्कारों को पुष्पक विमान और गणेश और कर्ण और अन्य मिथकीय आख्यानों, उद्धरणों से जोड़ने लगेंगे. जबकि वे आख्यान तो हमारी सामूहिक स्मृति और हमारे सामाजिक, सांस्कृतिक जीवन की अभिव्यक्तियां हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल अब दिखता है कि लगभग हथियार की तरह किया जा रहा है.

ज्योतिष, वैज्ञानिक दायरे से बाहर एक अत्यंत निजी पठनीयता का स्वयंभू इलाका हो सकता है. इसमें रुचि रखना या सलाह मशविरा लेना अपने अपने विवेक पर निर्भर है लेकिन ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए जिससे आपकी आस्था, आपकी राजनीति और आपकी मंशा से टकराने लगे.

आस्था को अगर आप सार्वजनिक दायरे में ले आएंगें तो यह सिलसिला तो न जाने कहां जाकर रुकेगा. अगले दिन कोई जादू टोने में चला जाए कि वह उसकी निजी आस्था है तो फिर हमारे समाज के दाभोलकर जैसे नायकों का क्या. वे क्या देशद्रोही थे जो इन अंधविश्वासों के खिलाफ अकेली लड़ाई लड़ रहे थे और आखिरकार मार डाले गये थे?

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