1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

दुनिया

आसान नहीं है राजनीति में इरोम का सफर

बहुत पुरानी कहावत है कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता. लेकिन लौह महिला के नाम से मशहूर मणिपुर की मानवाधिकार कार्यकर्ता इरोम शर्मिला राज्य में अगले महीने होने वाले चुनावों में इस कहावत को गलत साबित करने पर तुली हैं.

बीते साल अपना अनशन खत्म करने के बाद उन्होंने राजनीति में उतरने का फैसला कर इलाके की राजनीति में हलचल मचा दी थी. लेकिन अगले महीने होने वाले विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी महज तीन सीटों पर चुनाव लड़ रही है. ऐसे में सवाल यह है कि क्या इससे उनका वह मकसद पूरा होगा जिसके लिए वह अपनी 16 साल लंबी भूख हड़ताल तोड़कर राजनीति में उतरी थीं? उनका मकसद राज्य से सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम खत्म करना है और वह मुख्यमंत्री इबोबी सिंह के खिलाफ मैदान में हैं. उनकी पार्टी पीपुल्स रीसर्जेंस एंड जस्टिस एलांयस (प्रजा) ऑनलाइन चंदा जुटा कर चुनाव लड़ने वाली इलाके की पहली पार्टी बन गई है. प्रजा को अब तक लगभग 20 लाख का चंदा मिला है.

लंबा सफर

इरोम ने मणिपुर में कोई छह दशकों से लागू सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम के खिलाफ वर्ष 2000 में आमरण अनशन शुरू किया था. उनका यह अनशन बीते साल खत्म हुआ. उसी समय उन्होंने राजनीतिक पार्टी बना कर चुनाव लड़ने का एलान किया था. बेहद सादगी से चुनाव प्रचार में जुटी इरोम कहती हैं, "राजनीति उस काले कानून से लड़ने की नई रणनीति है. सशस्त्र बल अधिनियम एक राजनीतिक मुद्दा है तो उससे मुकाबले के लिए राजनीतिक इच्छा जरूरी है." मुख्य़मंत्री के खिलाफ थाउबल सीट से मैदान में उतरी शर्मिला का प्रचार बेहद सादगी भरा है. इलाके में उनके पोस्टर व बैनर नहीं नजर आते. वह कहती हैं, "मैं पोस्टरों और बैनरों पर भरोसा नहीं करती. मैं घर-घर जाकर लोगों को अपना मकसद समझा रही हूं और लोग इसे समझ भी रहे हैं."

कांग्रेस और बीजेपी जहां भव्य तरीके से प्रचार में जुटे हैं, वहीं शर्मिला मुठ्ठी भर कार्यकर्ताओं के साथ बेहद सादगी के साथ साइकिल पर चुनाव प्रचार के लिए निकलती हैं. उनका कहना है कि इस तरीके से चुनाव प्रचार करने पर किसी उम्मीदवार को एक लाख रुपए से ज्यादा खर्च करने की जरूरत नहीं है. उनकी पार्टी प्रजा ने सीटी को अपना चुनाव चिन्ह बनाया है. चुनाव अभियान के दौरान उनके कार्यकर्ता खासकर बच्चों में सीटियां बांट रहे हैं. प्रजा के संयोजक ईरेंडो लाइचोनबाम कहते हैं, "सीटी की आवाज साजिश व अन्याय के खिलफ लड़ाई का प्रतीक है. हम सीटी बजाकर लोगों की अंतरात्मा को जगाना चाहते हैं." इरोम खासकर महिला वोटरों को विशेषाधिकार अधिनियम की बुराइयों के बारे में समझाती हैं और उसका असर भी हो रहा है.

शर्मिला भी मानती हैं कि मुख्यमंत्री के खिलाफ उनकी लड़ाई आसान नहीं है.  लेकिन उनको उम्मीद है कि इलाके के लोग उनको वोट देंगे. वैसे उन्होंने थाउबल के अलावा अपने गृह क्षेत्र खुराई से भी परचा दाखिल किया है. क्या महज तीन सीटों पर चुनाव लड़ने से उनका मकसद पूरा होगा? इस सवाल पर वह कहती हैं, "अगर हममें से एक भी उम्मीदवार जीता तो वह विधानसभा के भीतर आम लोगों की आवाज बनेगा और सदन में विशेषाधिकार अधिनयम पर सवाल उठाएगा." प्रजा ने विशेषाधिकार अधिनियम के अलावा भ्रष्टाचार को भी अपना प्रमुख मुद्दा बनाया है. ईरेंडो कहते हैं कि कांग्रेस और बीजेपी जैसी बड़ी राजनीतिक पार्टियों ने 60 में से महज दो-दो महिलाओं को ही टिकट दिया है. लेकिन हमारी पार्टी की तीन में से दो उम्मीदवार महिलाएं हैं. इनमें राज्य की पहली मुस्लिम महिला उम्मीदवार नजीमा बीबी भी शामिल हैं. कांग्रेस और बीजेपी की आलोचना करते हुए शर्मिला कहती हैं कि आर्थिक नाकेबंदी पर शोर मचाकर यह दोनों असली मुद्दों से लोगों का ध्यान भटकाना चाहती हैं.

ऑनलाइन चंदा

इरोम की पार्टी चुनावी खर्च जुटाने के लिए ऑनलाइन चंदा जुटाने वाली मणिपुर की पहली राजनीतिक पार्टी है. ईरेंडो बताते हैं कि इस मद में अब तक 20 लाख रुपए से ज्यादा मिल चुके हैं. विदेश में रहने वाले मणिपुरियों ने भी काफी रकम दी है. हाल में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इस कोष में 50 रुपए दिए थे. अभिनेत्री रेणुका शहाने ने भी इतनी ही रकम दी है. आम आदमी पार्टी के सांसद भगवंत मान ने अपना एक महीने का वेतन दान दिया है. ईरोम कहती हैं, "ऑनलाइन चंदा जुटाने का एक मकसद चुनावों में बाहुबल और धनबल को खत्म करना भी है. इससे चुनावी खर्च में पारदर्शिता आएगी." वह कहती हैं कि उनके राजनीति में उतरने का दो ही मकसद है. पहला विशेषाधिकार अधिनियम को खत्म करना और दूसरा मणिपुर में सच्चे लोकतंत्र की बहाली. ईरेंडो बताते हैं कि इस तरीके से जुटने वाली रकम में से 10 लाख चुनाव के बाद पार्टी के कामकाज पर होने वाले खर्च के लिए रखा जाएगा और बाकी रकम चुनाव अभियान पर खर्च होगी.

राजनीतिक पर्यवेक्षकों की राय में इरोम के लिए राजनीति का सफर इतना आसान नहीं है. पहले उन्होंने कम से कम 20 सीटों पर चुनाव लड़ने का एलान किया था. लेकिन अब उनके सिर्फ तीन उम्मीदवार हैं. उनके भी जीतने की संभावना फिलहाल कम ही है. ऐसे में इरोम व उनकी पार्टी के राजनीतिक भविष्य के बारे में कुछ कहना मुश्किल है. वैसे यह बात इरोम भी समझती हैं. शायद इसलिए वह कहती हैं, "अबकी हमलोग महज तीन महीने की तैयारी के साथ मैदान में उतरे हैं. लेकिन अगली बार हमारे पास तैयारी के लिए पांच साल का समय होगा."

थाउबल के एक वोटर बिजेन इरोम कहते हैं, "आगे चल कर इरोम मणिपुर की नेता बन सकती हैं. पंद्रह साल से मुख्यमंत्री रहने और विकास का काम करने की वजह से इबोबी सिंह हीरो बन चुके हैं. शायद आगे चल कर इरोम भी उसी स्तर तक पहुंच जाएं." अब वोटरों पर इरोम की बातों का कितना असर होता है इसका जवाब तो 11 मार्च को आने वाले नतीजों से ही मिलेगा.

रिपोर्टः प्रभाकर

संबंधित सामग्री