1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

ब्लॉग

आसान नहीं भारत पाक रिश्तों की राह

भारत और पाकिस्तान के संबंधों का इतिहास “विचित्र किन्तु सत्य” किस्म की घटनाओं से भरा हुआ है. कुलदीप कुमार का कहना है कि संबंधों को सुधारने की कोशिश के बीच कथित भारतीय जासूस की गिरफ्तारी इसके जारी रहने का संकेत है.

जब भी भारत और पाकिस्तान के संबंधों में सुधार होने की उम्मीद की मद्धिम-सी रोशनी नजर आती है, उसी समय कोई-न-कोई ऐसी घटना घट जाती है जो उस रोशनी पर अंधेरे की चादर डाल देती है. हालांकि भारत में विपक्षी दल पठानकोट के वायुसेना के ठिकाने पर हुए आतंकवादी हमलों की जांच में सहायता देने के उद्देश्य से आए पाकिस्तानी जांच दल का विरोध कर रहे थे, लेकिन सरकार और उसके समर्थक यह मान कर चल रहे थे कि इससे भारत-पाकिस्तान द्विपक्षीय संबंधों में सुधार की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी. लेकिन ऐन इसी मौके पर पाकिस्तान ने दावा पेश कर दिया है कि उसने भारतीय नौसेना के एक कमांडर को बलोचिस्तान में गिरफ्तार कर लिया है और वह भारतीय खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) के लिए काम करता था तथा वहां पाकिस्तान सरकार के खिलाफ विद्रोह कर रहे बलोचियों को सहायता पहुंचाता था.

उसकी गिरफ्तारी द्वारा पाकिस्तान अपने उस आरोप को सिद्ध करने की कोशिश कर रहा है जिसे वह बहुत लंबे समय से लगाता आ रहा है. आरोप यह है कि बांग्लादेश की ही तर्ज पर भारत सरकार बलोच पृथकतावादियों को समर्थन और सहायता दे रही है और उसका लक्ष्य उसे पाकिस्तान से अलग करना है. जाधव की गिरफ्तारी पर पाकिस्तानी मीडिया में भी बहुत सनसनी फैली हुई है और जैसा कि प्रसिद्ध पाकिस्तानी रक्षा विशेषज्ञ आयशा सिद्दीका ने कहा है, "पाकिस्तान को उसका अजमल कसब मिल गया है." फर्क यह है, और यह बहुत बड़ा फर्क है कि जहां अजमल कसब का पाकिस्तान सरकार से कोई संबंध नहीं था, वहीं गिरफ्तार भारतीय का संबंध नौसेना और रॉ से है, यानी बलूचिस्तान में भारत का हस्तक्षेप सिद्ध होता दीख रहा है. पाकिस्तान सेना की ओर से एक वीडियो भी जारी किया गया है जिसमें गिरफ्तार भारतीय का इकबालिया बयान है.

Pakistan Islamabad Pressekonfernez zu angebl. Indischer Spion

इस्लामाबाद में कथित जासूसी कांड पर प्रेस कॉन्फ्रेंस

भारत का इंकार

भारत का कहना है कि कुलभूषण जाधव नामक यह व्यक्ति नौसेना से 2001 में ही स्वेच्छिक अवकाश ले चुका है और वह ईरान में कारोबार कर रहा था. उसका रॉ या भारत सरकार की किसी भी एजेंसी से कोई संबंध नहीं है. हो सकता है उसे ईरान से अपहृत करके बलूचिस्तान ले जाया गया हो और वहां उसकी गिरफ्तारी दिखा दी गई हो. उसके पास से हुसैन मुबारक पटेल के नाम का एक भारतीय पासपोर्ट भी बरामद हुआ है. कोई भी जासूस अपने ही देश का पासपोर्ट लेकर नहीं चलता. वीडियो भी बहुत विश्वसनीय नहीं लगता है.

हकीकत क्या है, यह तो कहना मुश्किल है लेकिन पाकिस्तान के इस कदम ने नरेंद्र मोदी सरकार और उसके समर्थकों के इस दावे पर पानी फेर दिया है कि पाकिस्तानी जांच दल को, जिसमें खुफिया एजेंसी आईएसआई का एक उच्चाधिकारी भी शामिल है, पठानकोट आने की इजाजत देकर उसने भारत की ओर से इसी तरह का दल पाकिस्तान भेजकर मसूद अजहर जैसे आतंकवादी सरगनाओं से पूछताछ का रास्ता साफ कर लिया है. माना जा रहा था कि भारत के इस कदम की पाकिस्तान में सराहना की जाएगी कि उसने आईएसआई के आला अफसर और जांच दल के अन्य सदस्यों के लिए अपने बेहद संवेदनशील वायुसैनिक ठिकाने के दरवाजे खोल दिए. लेकिन हुआ इसका उल्टा ही है. कुलभूषण जाधव से अभी तक भारतीय उच्चायोग के अधिकारियों को मिलने की इजाजत नहीं मिली है और उसके मिलने की संभावना भी बहुत ज्यादा नहीं लगती.

विरोधी हित

बलूचिस्तान में चीन ग्वादर बंदरगाह बना रहा है और वहां चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडॉर बनाने की योजना भी है. उधर ईरानी बलूचिस्तान में भारत बहुत दिनों से सक्रिय है. अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंचने के लिए उसे वैकल्पिक मार्गों की तलाश है. पाकिस्तानी सीमा के नजदीक जाहेदान में वह अपने वाणिज्यिक दूतावास के जरिये पाकिस्तान पर नजर रखता आया है. यह बहुत स्वाभाविक है कि भारत और पाकिस्तान एक-दूसरे के खिलाफ जासूसी करें क्योंकि सभी देश अपने दोस्तों और दुश्मनों पर नजर रखते हैं. अमेरिका द्वारा जर्मनी की चांसलर अंगेला मैर्केल की जासूसी कराना इसका ताजा उदाहरण है. लेकिन भारत और पाकिस्तान एक-दूसरे के जासूसों के साथ मानवीय व्यवहार नहीं करते और अक्सर पकड़े जाने के बाद उनका जीवन जेलों में सड़ते-सड़ते खत्म हो जाता है. इसके विपरीत शीतयुद्ध के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ एक दूसरे के जासूसों को पकड़ने के बाद उनकी अदला-बदली कर लिया करते थे. जाने-माने भारतीय रक्षा विशेषज्ञ सी. राजामोहन का विचार है कि अब समय आ गया है जब भारत और पाकिस्तान को भी यही व्यवस्था अपना लेनी चाहिए.

लेकिन ऐसा हो पाएगा, इसमें संदेह है. अभी तक के घटनाक्रम को देख कर तो यही लगता है कि भारत और पाकिस्तान के आपसी संबंधों में कदमताल चलती रहेगी और वे किसी न किसी कारण से आगे बढ़ने में असमर्थ रहेंगे. पाकिस्तान की निर्वाचित सरकार और सेना-केंद्रित सत्ता प्रतिष्ठान के बीच पूर्ण सहमति न होना उनके रास्ते की रुकावट बना रहेगा.

DW.COM

संबंधित सामग्री