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दुनिया

आवास की सुविधा बने बुनियादी मानवाधिकार

संयुक्त राष्ट्र के एक अधिकारी का मानना है कि बढ़ते शहरीकरण और आय असमानता के चलते भारत में आवासीय कानून को मानव अधिकारों के तहत शामिल किया जाना चाहिए.

आवासीय अधिकार पर संयुक्त राष्ट्र की विशेष दूत लेयलानी फरहा ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि भारत को आवासीय क्षेत्र में भी मानव अधिकारों पर आधारित एक व्यापक और अधिक दूरदर्शी कानून की आवश्यकता है. एक ऐसा कानून जो असमानता को दूर करता हो और लंबे समय के लिये रोड मैप मुहैया कराता हो.

फरहा ने कहा कि आवासीय नीतियों को बेघर और अवैध बस्तियों में रहने वाले लोगों को ध्यान में रखकर बनाया जाना चाहिए. रिपोर्ट में लिखा है कि देश में लोगों को घर मुहैया कराने के लिये तमाम योजनाएं जरूर चलाई जा रहीं हैं लेकिन इसके बाद भी तकरीबन 6 करोड़ की आबादी बेघर है या किसी न किसी रूप से इस समस्या से जूझ रही है.

हालांकि सरकार ने साल 2022 तक सबको मकान देने का आश्वासन दिया है लेकिन सरकार के इस दावे पर संशय बना हुआ है. एक ओर सरकार इस योजना को कारगार बनाने के लिये हर संभव कोशिश में लगी है लेकिन दूसरी ओर फिलहाल जमीनी हकीकत कुछ और है.

फरहा कहती हैं कि इन नीतियों का जोर लोगों को घर का मालिकाना अधिकार देने पर तो है लेकिन इसमें महिलाओं, धार्मिक अल्पसंख्यकों और आदिवासी लोगों पर ध्यान नहीं दिया गया है. परामर्शीय सेवायें देने वाली कंपनी एफएसजी के मुताबिक भारत की शहरी आबादी का एक चौथाई हिस्सा किफायती आवास की कमी के चलते मलिन बस्तियों और अवैध कॉलोनियों में रहता है. बढ़ते शहरीकरण के चलते भविष्य में यह समस्या और भी गहरा सकती है. फरहा ने इस समस्या को प्राथमिकता देते हुये इसे मानवाधिकारों में शामिल करने पर जोर दिया ताकि साल 2030 तक इस समस्या से छुटकारा पाया जा सके.

आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक देश में करीब 10 लाख लोग शहरी क्षेत्रों में बेघर है लेकिन गैर सरकारी संस्थाओं के मुताबिक यह आंकड़ा तीन गुना से भी अधिक है.

एए/आरपी (रॉयटर्स)

 

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