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विज्ञान

आवाज से ढूंढ निकाली ब्लू व्हेल

ऑस्ट्रेलियाई वैज्ञानिकों ने अंटार्कटिक महासागर में सबसे बड़ी ब्लू व्हेल को आवाज से ढूंढ निकाला है. इस जगह पर इस विशालकाय प्राणी को ढूंढना अब तक बहुत ही मुश्किल रहा है.

वैज्ञानिकों ने ध्वनि पकड़ने वाले यंत्रों की मदद से व्हेल के ठिकानों का पता लगाया और वहां तक पहुंचे. ऑस्ट्रेलियाई टीम की रिसर्चर वर्जीनिया एंड्रयू गॉफ ने बताया कि यह पहली बार हुआ है कि ध्वनि यंत्रों से व्हेल तक पहुंचा गया हो. ये बहुत गहराई में मिलने वाली लगभग अनसुनी आवाजें हैं.

डायनासोर से बड़ी व्हेल

ऑस्ट्रेलिया के पर्यावरण मंत्री टोनी बर्के ने बताया कि रिसर्चरों की टीम ने बड़ी मेहनत से लगभग सात हफ्ते ठंडे महासागर में बिता कर यह उपलब्धि हासिल की. ब्लू व्हेल लगभग 30 मीटर लंबी और 180 टन भार वाली स्तनपायी जीव है. इसकी जीभ का ही वजन हाथी के बराबर होता है और इसका दिल एक कार जितना बड़ा होता है.

उन्होंने बताया कि सबसे बड़ा डायनासोर भी इसके सामने छोटा लगेगा. एंड्रयू गॉफ कहती हैं, "इस दौरान हमारा छह मीटर लंबा जहाज 30 मीटर लंबी व्हेल के बिलकुल बराबर में था. उसके सामने मैं छोटी सी चींटी की तरह महसूस कर रही थी."

शरीर के नमूने

वैज्ञानिकों ने जांच के लिए व्हेल के 23 बायोप्सी नमूने लिए और दो व्हेलों के शरीर पर सैटेलाइट चिप लगा दी गई जिससे उन्हें वह जानकारी मिल सके जो अब तक संभव नहीं थी. इससे उनके खान पान के तरीकों का भी पता चल सकेगा. एंड्रयू गॉफ मानती हैं कि व्हेल को समझने का यह तरीका अब तक काफी कामयाब रहा है और इससे ब्लू व्हेल के बारे में मिली जानकारी आगे की रिसर्चों के लिए रास्ते साफ करेगी.

व्हेल के शरीर पर लगाए गए दो सैटेलाइट चिप में से एक ने 17 दिन बाद काम करना बंद कर दिया जबकि दूसरा लगभग दो हफ्ते बाद भी काम कर रहा था. एंड्रयू गॉफ के अनुसार अंटार्कटिक ब्लू व्हेल के बारे में अभी भी बहुत कम जानकारी है. व्हेल समुद्री जीव है और इसे दुनिया का सबसे बड़ा प्राणी माना जाता है. ब्लू व्हेल मछली नहीं, बल्कि स्तनपायी जीव है.

एंड्रयू गॉफ ने कहा, "हमें अब तक यह नहीं पता लग पाया है कि वे कब कहां जाती हैं. हमें नहीं पता कि इनमें से कौन सी प्रवास करती हैं और कौन सी नहीं. इन सैटेलाइट चिपों से हमें पता चल सकता है कि ये अपना पेट भरने के लिए क्या करती हैं और अपना ज्यादातर समय कहां और क्या करने में बिताती हैं. यह सारी जानकारी हमारे बहुत काम आने वाली है."

लुप्त होती ब्लू व्हेल

इस रिसर्च में इस्तेमाल हुई ध्वनि तकनीक से सैकड़ों किलोमीटर की दूरी से इन व्हेलों के ठिकानों का अंदाजा लगाया जा सकता है. ध्वनि तकनीक विशेषज्ञ ब्रायन मिलर ने बताया कि उन्होंने इस रिसर्च में व्हेलों के गुनगुनाने की आवाज करीब 626 घंटों तक रिकॉर्ड की. इन्हीं आवाजों का पीछा करते करते वे अपने जहाज पर व्हेल के ठिकाने तक पहुंच गए. रिसर्चरों का मानना है कि अब दुनिया में सिर्फ कुछ हजार ब्लू व्हेल ही बची हैं.

जापान हर साल वैज्ञानिक रिसर्च के नाम पर कई व्हेलों को मार देता है. बर्के ने कहा कि वैज्ञानिक रिसर्चों के लिए व्हेलों का मारा जाना बिलकुल जरूरी नहीं. 20वीं शताब्दी में औद्योगिक स्तर पर व्हेलों को मारा गया जिसके वजह से अब अंटार्कटिक महासागर में बहुत कम ब्लू व्हेल बची हैं. ऑस्ट्रेलियाई वैज्ञानिकों की इस रिसर्च का मकसद ब्लू व्हेल की तादाद, उनके ठिकानों और उनके व्यवहार को बेहतर ढंग से समझना है.

एसएफ/एजेए (एएफपी)

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