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दुनिया

आलोचक एमनेस्टी पर आलोचना के हमले

मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने वैश्यावृति के गैरअपराधीकरण का विवादास्पद फैसला लिया है. फैसले का महिला संगठन और खुद एमनेस्टी के समर्थक विरोध कर रहे हैं. एमनेस्टी के ट्विटर पेज पर आलोचना की झड़ी लगी है.

एमनेस्टी के फैसले से पहले ही महिलाओं की तस्करी का विरोध करने वाले संगठन ने चेतावनी दी थी कि नई नीति से एमनेस्टी का नाम कलंकित होगा. फैसले के बाद जर्मनी की महिला अधिकारों के लिए लड़ने वाली पत्रिका एम्मा ने एमनेस्टी पर दलालों के अधिकारों के लिए लड़ने का आरोप लगाया है और इस फैसले को मानवाधिकार संगठन का अंत बताया है.

एमनेस्टी को अपने फैसले का बचाव करने की रणनीति तय करनी होगी. सबसे ज्यादा प्रतिक्रिया एमनेस्टी के ट्विटर पेज पर हो रही है और शायद ही कोई उसके फैसले के समर्थन में सामने आया है. ट्विटर यूजर लीजा ने असंतोष जाहिर करते हुए कहा कि संस्था को अब यह कहने का हक नहीं कि वह मानवाधिकारों के लिए लड़ती है.

एजिल हार्डर ने एमनेस्टी को चेतावनी दी है कि दलालों का समर्थन आसान नहीं तो लुइजे ने अपने गुस्से का इजहार करते हुए एमनेस्टी की वॉल पर लिखा है कि महिलाओं को खरीदने का अभेद्य अधिकार नहीं है.

ओली लार्स ने एमनेस्टी को बाय करते हुए ट्वीट किया है कि वह अब ऐसी संस्था नहीं है जिसपर महिलाओं के मानवाधिकारों के संघर्ष में भरोसा किया जा सके.

तो इना शेवचेंको ने टिप्पणी की है कि एमनेस्टी की नई वैश्यावृति समर्थक नीति सेक्स वर्करों के साथ दलालों और ग्राहकों को भी अपराध के दायरे से बाहर निकालती है.

किसी संस्था की किसी नीति की आलोचना तो एक बात है, लेकिन एमनेस्टी के ताजा फैसले के बाद बहुत से सदस्यों ने संगठन से अलग होना भी शुरू कर दिया है. मैथ्यू हॉलोवे ने लिखा है कि वे अपनी सदस्यता फीस वापस करने के लिए एमनेस्टी को लिख रहे हैं.

सेक्स कारोबार की यातना भुगतने वाले महिलाओं को आवाज देने वाली संस्था स्पेस इंटरनेशनल ने एमनेस्टी की सदस्याता छोड़ने और सेक्स कारोबार के पीड़ितों का समर्थन करने की मांग की है.

एमनेस्टी इंटरनेशनल को विरोध के इस आयाम का भले ही अंदाजा न रहा हो, विरोध का अंदाजा तो था ही. जर्मनी में विरोधियों को शांत करने के लिए हफ्ते भर पहले उसने एआईफ्राउएनरेष्टे ट्विटर हैंडल से ट्वीट किया था कि संगठन 1961 से दुनिया भर में लोगों को अपना अधिकार पाने में मदद कर रहा है.

समर्थन के आधार को बनाना अब मानवाधिकार संगठन की सबसे बड़ी चुनौती है.

एमजे/आईबी

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