आम आदमी या दंगाई | ब्लॉग | DW | 06.01.2015
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ब्लॉग

आम आदमी या दंगाई

क्या पेगीडा इस्लामी कट्टरपंथियों के खिलाफ उचित प्रतिरोध है या फिर विरोध इस्लाम का हो रहा है? और इसमें नई एएफडी पार्टी की क्या भूमिका है? डॉयचे वेले के फोल्कर वाग्नर इसमें एएफडी की एक खतरनाक भूमिका देखते हैं.

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पेगीडा का प्रदर्शन

"काले व्यक्ति से किसे डर है," यह कभी बच्चों का लोकप्रिय खेल हुआ करता था. उन दिनों जब स्मार्टफोन का आविष्कार नहीं हुआ था, खबर शाम में टेलिविजन से और सुबह अखबार से मिलती थी. अनालोग काल का डर दिखाने वाला खेल खत्म नहीं हुआ है. अब इसे बालिग खेल रहे हैं. हफ्ते के हफ्ते, हर सोमवार को, जब पश्चिम के इस्लामीकरण के खिलाफ राष्ट्रप्रेमी यूरोपीय संगठन पेगीडा अलग अलग शहरों में प्रदर्शन का आह्वान करता है.

हजारों चिंतित पश्चिमवासी इस्लाम से डर की बात करते हैं और रैली निकालकर इसका सार्वजनिक इजहार कर रहे हैं. हजारों लोग इसका विरोध कर रहे हैं और लगभग सभी पार्टियों के राजनीतिज्ञों से समर्थन पा रहे हैं. विरोधी प्रदर्शनकारी पेगीडा के विदेशी विरोधी धड़े का विरोध कर रहे हैं. बहुत से लोग कुछ हद तक सही भी हैं, कम ही स्थिति को भांप पा रहे हैं. सवाल यह है कि क्या पेगीडा के प्रदर्शनकारियों के खिलाफ विरोधी प्रदर्शनकारियों और राजनीतिज्ञों की आलोचना सही है. नई रुझान का सही आकलन नहीं हो रहा. और यह खतरनाक है क्योंकि मामला नियंत्रण से बाहर हो सकता है.

पेगीडा आंदोलन इसलिए भी खतरनाक है कि वह इस्लाम की धुंधली समझ पेश कर रहा है. शुरुआत में हत्यारे इस्लामी कट्टरपंथियों, अल्लाह के नाम पर चलते कैमरा के सामने हत्या करने वाले उग्रपंथियों की बात हो रही थी. इस बीच प्रदर्शनकारियों का बड़ा हिस्सा इस्लाम का ही विरोध कर रहा है. इसके अलावा शरणार्थियों, गृहयुद्ध से बचने के लिए पनाह चाहने वालों की भी बात हो रही है जो कथित तौर पर पश्चिमी सभ्यता के लिए खतरा हैं. ऐसा होता है जब अड्डा देने वाले लोग जर्मनी को बचाने के लिए अपने साधारण नुस्खे के साथ सड़कों पर उतर जाते हैं. पेगीडा सामान्य हल देने वाला मंच है. समस्या और भी मुश्किल हो जाती है जब दुनिया की आसान व्याख्या का समर्थन एक पार्टी भी करती हो, जैसे कि एएफडी जो इस बीच तीन विधान सभाओं में है.

Anti-Kögida-Demonstration in Köln

कोलोन में विरोधी प्रदर्शन

जर्मनी के एक तिहाई लोगों में, जो पेगीडा में उचित मुद्दों का प्रतिनिधित्व देखते हैं, एएफडी के भी समर्थक हैं. कुछ लंबे समय से चल रहे विवाद को उसका उत्तर मिल गया है कि एएफडी में समाज के मध्य के लोग हैं या वह विदेशी विरोधी पार्टी है. नई पार्टी का बड़ा हिस्सा सामान्य आदमी के लबादे में आगजनी करने वाला है. यूरोप की आलोचना कर लोकप्रिय हुई पार्टी जर्मनी के पूर्वी हिस्से में विदेशी विरोधी नारे दे रही है, यह कोई संयोग नहीं है. जबकि पेगीडा को पश्चिम में ज्यादा समर्थन नहीं मिल रहा है, पूरबी हिस्सा गैर जर्मनों के खिलाफ भावनाओं के लिए खुला नजर आ रहा है. ड्रेसडेन में जब "हम जनता हैं" का नारा लगता है तो लाइप्जिग 1989 की तरह वह लोकतांत्रिक नहीं लगता, बल्कि हदें तय करता दिखता है, मुसलमानों और शरणार्थियों के खिलाफ.

और एएफडी पेगीडा का मेंटर बनता दिखता है. वह सड़क की आवाज का संसदीय चेहरा है. वह विरोध को संसद में ले जा रहा है. एक सहबंध जिसके बुरे नतीजे हो सकते हैं.समाज का मध्यवर्ग दक्षिणपंथ की ओर जा रहा है. ड्रेसडेन से सोमवार वाले प्रदर्शन पर नियमित निगाह रखने वाले पर्यवेक्षक रैली में घरेलू महिलाओं, पेंशनभोगियों, युवा अकादमिशियनों और नवनाजीवादियों को एक साथ देख रहे हैं. इस आंदोलन का व्यापक होना डर पैदा करता है.

यह पश्चिम जर्मन बहुसांस्कृतिक समाज के खिलाफ पूर्वी जर्मनी का आम विरोध लगता है. इस बीच यह विरोध आम जनांदोलन का रूप लेता जा रहा है. गरीबी का शिकार होने के डर को आवाज दी जा रही है, पेंशन की रकम की तुलना शरमार्थियों पर होने वाले खर्च से की जा रही है. जर्मनी एकीकरण के बाद के अनुभव असली और कथित नुकसान सहने वालों को आंदोलित कर रहे हैं. देश के राजनीतिक दलों के लिए यह बहुत बड़ी चुनौती है, लेकिन उन्हें रोष और क्षोभ के अलावा कुछ नहीं सूझ रहा. मैदान को अब एएफडी के लिए छोड़ दिया गया है.

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