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ब्लॉग

आप के चलते बदलती भारतीय राजनीति

दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी (आप) को मिली अप्रत्याशित सफलता और उसके बाद दिल्ली में उसकी सरकार के बनने से राष्ट्रीय राजनीति में भी बदलाव की आहटें सुनी जाने लगी हैं.

स्वयं आम आदमी पार्टी का आत्मविश्वास इतना अधिक बढ़ गया है कि वह न केवल हरियाणा विधानसभा के चुनाव बल्कि लोकसभा के चुनाव में भी पूरी ताकत झोंक कर भाग लेना चाहती है. पहले आप के नेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने लोकसभा की 100 सीटों पर उम्मीदवार खड़ा करने की घोषणा की थी, लेकिन जनता में पैदा उत्साह और राजनीतिक संस्कृति में परिवर्तन की उम्मीद को देखते हुए अब आप ने 300 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला लिया है. दिल्ली के अलावा अनेक अन्य शहरों से जानी-मानी शख्सियतों के आप में शामिल होने के समाचार मिलने लगे हैं. प्रसिद्ध नृत्यांगना और अभिनेत्री मल्लिका साराभाई ने भी आप का पहचान बन चुकी सफेद टोपी पहन कर पार्टी में शामिल होने की घोषणा की है.

आज इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता कि सीमित साधनों के बावजूद आप के उम्मीदवारों को दिल्ली में मिली आशातीत सफलता ने पूरे देश के स्तर पर लोगों के मन में भ्रष्टाचार की समाप्ति, जनोन्मुख राजनीति की शुरुआत और राजनीतिक संस्कृति में बदलाव की आशा जगा दी है और उनमें इस समय बेहद उत्साह है. स्वाभाविक है कि आप जनचेतना में आए इस उभार का शीघ्र से शीघ्र राजनीतिक लाभ उठाना चाहती है, क्योंकि उसे भी यह मालूम है कि जनता में पैदा होने वाले इस प्रकार के उत्साह की उम्र अक्सर बहुत अधिक नहीं होती. कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही इस नई परिस्थिति से परेशान हैं. बीजेपी कुछ अधिक परेशान है क्योंकि प्रधानमंत्री पद के लिए उसके उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की चमक अचानक फीकी पड़ गई है और पत्र-पत्रिकाओं तथा टीवी चैनलों ने उनका नोटिस लेना काफी कम कर दिया है. इस समय आप ही सबसे अधिक चर्चा में है. अंग्रेजी दैनिक ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया' द्वारा कराये गए एक सर्वेक्षण ने चौंकाने वाले नतीजे प्रस्तुत किए हैं और इसके अनुसार देश के 44 प्रतिशत मतदाता लोकसभा चुनाव में आप को वोट देना चाहते हैं. यदि यह सर्वेक्षण हकीकत के नजदीक है, तो यह बीजेपी के लिए बहुत बड़ा झटका होगा. जहां तक कांग्रेस का सवाल है, तो उसके सर्वाधिक आशावादी नेता को भी यह उम्मीद नहीं होगी कि अगली लोकसभा में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बन सकती है.

हिंदूवादी ताकतों की झुंझलाहट का बात से लगाया जा सकता है कि बुधवार को हिन्दू रक्षा दल नाम के एक संगठन के कार्यकर्ताओं ने आप नेता प्रशांत भूषण के कश्मीर संबंधी बयान के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए पार्टी के मुख्यालय पर हमला बोल दिया. इस हमले के बावजूद अरविंद केजरीवाल अपने या अपनी पार्टी के लिए पुलिस सुरक्षा लेने पर राजी नहीं हुए. जनता उनकी इस बात से भी बहुत प्रभावित है कि वे मुख्यमंत्री होने के बावजूद न स्वयं विशेष सुविधाएं ले रहे हैं, न अपनी पार्टी के मंत्रियों और विधायकों को लेने दे रहे हैं. उन्होंने मंत्रियों और अधिकारियों की कारों पर लाल बत्ती लगाने पर भी प्रतिबंध लगा दिया है. इन दिनों दिल्ली में विशेषाधिकारों के मनमाने इस्तेमाल की हालत यह है कि हर विशिष्ट व्यक्ति अपने लिए ट्रैफिक से खाली सड़क चाहता है. केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश भी अपनी कार पर लाल बत्ती का इस्तेमाल नहीं करते, इसलिए पिछले दिनों उन्हें तीन बार ट्रैफिक में फंसे रहना पड़ा क्योंकि सेना पुलिस ने थलसेनाध्यक्ष, वायुसेनाध्यक्ष और नौसेनाध्यक्ष के लिए ट्रैफिक रोककर सड़क को खाली किया हुआ था. रमेश ने इस संबंध में रक्षामंत्री ए के एंटनी को एक पत्र लिखकर विरोध प्रकट किया है. जयराम रमेश ने जो अनुभव तीन बार किया, आम नागरिक उसे रोज करता है. इसलिए वह केजरीवाल की सादगी का प्रशंसक है और उसे उम्मीद है कि भ्रष्टाचार कम होगा.

इस सबका दूसरी पार्टियों पर भी असर पड़ा है और उन्हें समझ में आने लगा है कि चुनाव में जीतते ही नेताओं का जनसेवक से जनस्वामी बन जाने को जनता अब अधिक दिनों तक बर्दाश्त करने के लिए तैयार नहीं है. इसलिए राजस्थान की नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, जो कल तक अपने सिंधिया राजवंश से होने को भुनाती थी, ने केजरीवाल की तर्ज पर ही फैसला लिया है कि वह मुख्यमंत्री आवास में न रहकर विधायक वाले मकान में ही रहेंगी. यही नहीं, अब वे चौराहे पर लाल बत्ती के हरी होने का इंतजार करने को भी तैयार हैं और अपनी कार पर लाल बत्ती नहीं लगवा रहीं. केजरीवाल ने दिल्ली में बिजली की दरों में कम करने के लिए प्रयास शुरू किए हैं और सीएनजी की हाल ही में बढ़ाई गई दरों को कम कराने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाने का फैसला लिया है. इसकी देखा-देखी मुंबई में कांग्रेस नेता संजय निरूपम ने भी महाराष्ट्र सरकार से बिजली और सीएनजी की दरों में कटौती करने की अपील की है. यानि अब दूसरी पार्टियों को भी एहसास होने लगा है कि पुराने ढर्रे पर राजनीति नहीं चल सकती. क्षेत्रीय पार्टियों को भी इस हकीकत से जल्दी ही दो-चार होना पड़ेगा.

भारत के पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त नवीन चावला कम पैसे और साधनों के साथ चुनाव लड़ने और जीतने को भारतीय राजनीति में एक बड़े परिवर्तन की शुरुआत मानते हैं क्योंकि इससे वह व्यक्ति भी चुनाव लड़ने की सोच सकता है जो बहुत अधिक साधनसंपन्न नहीं है. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यदि लोकसभा चुनाव में आप को 50-60 सीटें मिल गईं, तो वह राष्ट्रीय राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाने की स्थिति में होगी. लेकिन क्या वह इसके लिए तैयार है?

यह एक यक्ष प्रश्न है जिसका उत्तर अभी किसी के भी पास नहीं है, हां आशंकाएं जरूर हैं. क्या सिर्फ भ्रष्टाचार मिटाने के एक ही मुद्दे पर बनी पार्टी राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में सोचने में समर्थ होगी? प्रशांत भूषण का यह बयान, जिसे उन्हें वापस लेना पड़ा, कि जम्मू-कश्मीर में सेना को विशेषाधिकार देने वाला कानून वापस लेने के मुद्दे पर जनमतसंग्रह कराया जाना चाहिए, इन आशंकाओं को बल देता है. 2011 में प्रशांत भूषण ने इससे भी एक कदम आगे जाकर कहा था कि जनमतसंग्रह के द्वारा तय किया जाना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर भारत में रहेगा या नहीं. आप की आर्थिक नीतियों, विकास संबंधी विचारों और विदेश नीति के बारे में अभी तक जनता अंधेरे में है. सांप्रदायिकता के मुद्दे पर भी अभी उसका स्पष्ट रुख सामने नहीं आया है. कुछ समय पहले अरविंद केजरीवाल के बरेली जाकर एक विवादास्पद मौलाना से मिलने पर बवाल मचा था. यदि आप को राष्ट्रीय राजनीति में कारगर भूमिका निभानी है, तो उसे इन सभी मुद्दों पर अपनी सुचिन्तित नीति से जनता को अवगत कराना होगा.

ब्लॉग: कुलदीप कुमार

संपादन: महेश झा

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