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ब्लॉग

आप, अफ्रीका और उत्पीड़न

दिल्ली में आप पार्टी की सरकार के एक मंत्री और उनके दलबल का अभियान भारत से लेकर अफ्रीका तक सबको चौंका रहा है. बात देशों की मित्रता, अश्वेत युवाओं के उत्पीड़न और आप की नैतिकता के बीच टकराव और धर्मसंकट में फंसी है.

ये तो कानून मंत्री सोमनाथ भारती ही बेहतर जानते होंगे कि उनके पास क्या पुख्ता सबूत थे जिनके आधार पर वो लगभग कूच के अंदाज में दलबल समेत दक्षिणी दिल्ली के उस कोने में पहुंचे जहां उनके मुताबिक एक मकान से सेक्स और ड्रग का रैकेट चलाया जा रहा था. और ये कि इसके सरगना अफ्रीकी लोग थे. आरोप ये है कि इस सिलसिले में युगांडा और नाईजीरिया के युवक युवतियों के एक दल को जबरन गाड़ी में डालकर ले जाया गया, ड्रग सेवन की जबरन जांच करायी गई. इन युवकों ने मंत्री और उनके लोगों पर जो आरोप लगाए हैं वे एक स्थायी या अस्थायी नागरिक के मानवाधिकार के हनन का सवाल तो उठाते ही हैं, नस्लवाद और रंगभेद के उभार का भी इशारा करते हैं. गोवा की सरकार एक नाईजीरियाई युवक के मुद्दे पर इन्हीं आलोचनाओं के घेरे में आ चुकी है.

अफ्रीकी देशों की गरीबी और वहां की सरकारों की काहिली युवाओं को नए अंधेरों की ओर धकेल रही है. भूमंडलीय पूंजी ने उन्हें और लाचार और आतुर और विवश बनाया है. युगांडा का ही अगर जिक्र करें तो द गार्जियन की एक रिपोर्ट के मुताबिक वो दुनिया का सबसे ज्यादा युवा आबादी वाला देश है लेकिन अफ्रीका में सबसे ज्यादा बेरोजगारी वाला देश भी. युवाओं के लिए रोजगार के मौके पैदा नहीं हुए हैं लिहाजा एक हिस्सा देश और देश से बाहर भटकाव भरे रास्तों में गुम हो रहा है. एक दौर की गुटनिरपेक्ष आंदोलन की ताकतें मुक्त बाजार के आगे नतमस्तक हैं और भारत से अफ्रीका तक देशी-विदेशी बहुराष्ट्रीय जमावड़े सक्रिय हैं. ऐसे में कहां कौन किस मकसद से उपस्थित है ये बात और धुंधली होती जा रही है. असमंजस की इसी धुंध में आप अपने मंत्री का अब बचाव कर रही है और इसी धुंध की आड़ में केंद्र सरकार अफ्रीका से अपने ऐतिहासिक रिश्तों का हवाला दे रही है. भारत के लिए ये बहुत पेचीदा स्थिति है.

इसका एक पहलू व्यवहार से भी जुड़ा है. एक विदेशी को लेकर हमारा नजरिया क्या है. हम इतने अतिरेक में क्यों सोचते हैं, अगर वो महिला है या अश्वेत है तो इसे भारतीय समाज में आ रही उग्रता और अतिवादिता से भी जोड़ कर देखा जा सकता है. विदेशियों के प्रति हमारा व्यवहार शालीनता के दायरे से बाहर निकलकर इस किस्म की अतिशयताओं में तो जाता ही है, इसके बर्बर और घिनौने रूप भी देखने को मिलते हैं, विदेशी महिलाओं के साथ यौन अपराधों में. भारत की छवि यौन हमलों पर आतुर मदांध पुरुषों के देश के रूप में बन रही है. हमने नैतिकता के पाठ तो बहुत पढ़े-पढ़ाए लेकिन उसे अपनी आत्माओं तक नहीं पहुंचाया. ऐसी ताकत का क्या करना जहां आप नैतिक रूप से विफल रह जाते हैं.

Arvind Kejriwal Indien Ministerpräsident Porträt

अरविंद केजरीवाल की चुनौती

दिल्ली मामले को देखें तो वो अब न सिर्फ केंद्र बनाम राज्य, आप बनाम कांग्रेस की राजनीति का सबब बन गया है, इसमें भारत के मित्र देशों के साथ संबंधों और सहयोग के बिंदुओं को भी बहस में ला दिया है. खासकर अफ्रीकी मुल्कों और भारत के संबंधों पर, जो संघर्ष की साझा विरासत और गुलामी और उपनिवेशी हमलों के खिलाफ साझा एकजुटता के प्रतीक रहे हैं.

अब कुछ खतरे हैं जो किसी भी सदाशयता के आड़े आ सकते हैं. मसलन कोई व्यक्ति फिर वो अफ्रीका का हो या अमेरिका का या किसी और देश का, किसी अपराध में लिप्त पाया जाता है या उसके बारे में खुफिया सूचनाएं मिलती हैं और इस मामले को उठाया जाता है तो इसे कुछ वितंडावादी अपनी सुविधा से देखेंगे. मामले को तूल देने में कांग्रेस बीजेपी पीछे नहीं है. मीडिया में भी जैसे अब सुनियोजित ढंग से आप के खिलाफ कुछ न कुछ खोजा और खोदा जा रहा है. ऐसे में आप को सजगता का एक नया मोर्चा रखना होगा. दायित्व निभाने की और सार्वजनिक जीवन में व्यवहार की बारीकियां अगर नए सिरे से और ज्यादा गंभीरता से देख ली जाएं तो अच्छा होगा.

आप की चिंता कितनी भी जेनुइन रही हो लेकिन लांछन उस पर अब यही लग रहा है कि वो भी उन जैसी निकली जो दिन रात मॉरल पुलिसिंग करते फिरते हैं. वैसे दिल्ली पुलिस के हठधर्मी रवैये के खिलाफ उसका आंदोलन और मंशा सही है लेकिन अफ्रीकी युवाओं के साथ व्यवहार से उसे जोड़ना, राजनीति की गलत टाइमिंग है. और टाइमिंग से आशय यहां नैतिकता से है. दिल्ली पुलिस के कामकाज पर आवाज उठाने के और भी प्रकरण थे.

अपराधियों की धरपकड़ का ये तरीका जरा राजा महाराजाओं बादशाहों के दौर का लगता है, चार सिपाही लेकर जाएं और पकड़ कर दरबार में हाजिर करें. हम नहीं जानते कि सोमनाथ भारती के निर्वाचन क्षेत्र की मोहल्ला सभा ने उन्हें क्या फीडबैक दिया होगा, किस तरह का दिया होगा, उनका अश्वेत समुदाय के प्रति नजरिया कैसा होगा, क्या उनके पूर्वाग्रह होंगे. महिलाओं के खिलाफ आधी रात के एक्शन में इस तरह का व्यवहार सवाल तो खड़े करता ही है.

दिल्ली पुलिस की उचित प्रक्रिया अपनाए जाने की दलील से भी इत्तफाक नहीं किया जा सकता. वो इस दलील को खुद ही तोड़ती मरोड़ती रही है लेकिन आप की सरकार से ये अपेक्षा की जा सकती है कि थोड़ा धैर्य रख कर और सबूत जुटाए जाते. एक अभियान ही छेड़ना था तो नैतिक और नागरिक जिम्मेदारी और देश के सम्मान से जुड़े उसूलों को ध्यान में रखकर छेड़ा जाता.

इतनी हड़बड़ी किस बात की. क्या आप चंद दिनों के लिए राजनीति में है. फिर सब अपने घर चले जाएंगे. क्या ये लड़ाई तात्कालिक है?

ब्लॉग: शिवप्रसाद जोशी

संपादन: महेश झा

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