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मनोरंजन

आपसी प्यार और नफरत की कहानी गोल्ड स्ट्रक

स्विट्जरलैंड की खूबसूरत वादियों में तो भारतीय कलाकारों को नाचते देखना आम बात है अब बीजिंग की पृष्ठभूमि में भारतीय आईटी इंजीनियर और चीनी केमिस्ट के बीच दोस्ती को फिल्माए जाने की तैयारी है. भारत और चीन का साझा प्रोजेक्ट.

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गोल्ड स्ट्रक फिल्म एक्शन कॉमेडी है और चीनी केमिस्ट टॉमी और भारत के आईटी इंजीनियर संजय के बीच दोस्ती पर आधारित है जो आपस में टीम बनाकर कांस्य पदक को स्वर्ण पदक में बदल देने का सपना पूरा करते हैं.

यह फिल्म भारत और चीन के बीच प्यार और नफरत के रिश्ते को परिलक्षित करती है. गोल्ड स्ट्रक फिल्म की निर्देशक सिंडी श्यू ने बताया "चीन और भारत में बहुत समानताएं हैं, हालांकि वे लगभग हर क्षेत्र में एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हैं. इस फिल्म में जो दो चरित्र दिखाए गए हैं वे एक तरह से दो देश हैं. उनमें कुछ गलतफहमियां हैं लेकिन वे एक दूसरे को खोने का जोखिम मोल नहीं ले सकते और उनका साथ दुनिया को बेहतर बनाने में मदद करता है."

लाइट हाउस प्रोडक्शन्स के सीईओ सिंडी श्यू का कहना है कि इस फिल्म के जरिए वह एक ढर्रे में बंधे उस सोच को चुनौती देने की कोशिश करेंगी जिसके मुताबिक चीनी आक्रामक प्रतिद्वंद्वी होते हैं और भारतीय आईटी के क्षेत्र में तो कुशल होते हैं लेकिन सामाजिक रूप से व्यवहारिक नहीं होते. सिंडी श्यू वैसे भी भारत और चीन को खुद में संयोजित करने का प्रयास करती हैं. नियमित रूप से वह चीनी मार्शल आर्ट ताई ची और भारतीय योग का अभ्यास करती हैं.

गोल्ड स्ट्रक फिल्म को चीन की सरकारी कंपनी की मदद भी मिल रही है और इसमें दोनों देशों के बड़े कलाकारों के काम करने की संभावना है. इस फिल्म का बजट 1 करोड़ अमेरिकी डॉलर है. भारतीय लेखकों के साथ मिलकर इस फिल्म की कहानी सिंडी श्यू ने लिखी है और उन्हें उम्मीद है कि बॉलीवुड के बड़े नाम उनकी फिल्म में काम करने के लिए तैयार होंगे. इस फिल्म के प्रोजेक्ट को चीन की सरकारी कंपनी चाइना फिल्म ग्रुप कॉरपोरेशन से भी मदद मिल रही है.

भारत और चीन के बीच पहले साझा फिल्म प्रोजेक्ट की तैयारी ऐसे समय में हो रही है जब कुछ ही दिन पहले चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ आपसी मतभेदों को दूर करने के इरादे से दिल्ली के दौरे पर आए. फिल्म को अंग्रेजी, चीनी और हिंदी भाषा में रिलीज किया जाएगा.

1960 के दशक में हिंदी फिल्में और कलाकार खासकर राज कपूर चीन में काफी लोकप्रिय थे और पुरानी पीढ़ी के चीनी आवारा हूं गाने को आज भी पहचान लेते हैं. आधिकारिकी रूप से चीन में साल में 20 विदेशी फिल्मों को दिखाया जा सकता है और कभी कभार हिंदी फिल्मों को दिखाए जाने की अनुमति मिल जाती है.

रिपोर्ट: एजेंसियां/एस गौड़

संपादन: ओ सिंह

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