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दुनिया

आदिवासियों को अधिकार माओवाद का जवाब

दशकों से भारत सरकार माओवादियों से लड़ रही है. हालात बता रहे हैं कि समस्या ताकत दिखाने से नहीं बल्कि आदिवासी अधिकारों की रक्षा करने से सुलझेगी.

11 नवंबर 2013 को छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों में लोगों ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया लेकिन कुछ मतदान केंद्रों पर कड़ी सुरक्षा के बावजूद माओवादियों ने हमला किया, कारण मतदान का बायकॉट. ये हमले इलाके में होने वाली हिंसा का एक छोटा सा उदाहरण हैं और यही कारण भी है कि यहां पुलिस की तैनाती भी काफी है. बस्तर का अदिवासी इलाका माओवादी घुसपैठ का केंद्र है.

घुसपैठ की शुरुआत

इन माओवादियों को भारत में नक्सली कहा जाता है. यह शब्द पश्चिम बंगाल के गांव नक्सलबाड़ी से आया, जहां से इस अभियान की 1967 में शुरुआत हुई. माओवादी मामलों के विशेषज्ञ और भारतीय लेखक दिलीप साइमन बताते हैं कि नक्सलवादियों का मुख्य लक्ष्य एक कम्युनिस्ट देश बनाना है जिसके लिए माओ की सैन्य राजनीतिक नीति "पीपल्स वॉर" का इस्तेमाल किया जाए. उनका यह मानना है कि भारत आज वैसी ही स्थिति में है जिसमें 1930 के दौरान चीन था. साइमन ने डीडबल्यू से बातचीत में कहा, "भारत अर्ध सामंतवादी और अर्ध उपनिवेशवादी समाज है." भारत में माओवादियों की संख्या 50,000 के करीब मानी जाती है. भारत में नक्सली खनिज संपन्न और कटे हुए इलाकों में प्रभावशाली हैं और दक्षिण से पूर्वोत्तर तक फैले हुए हैं, जिसमें आंध्र प्रदेश से लेकर झारखंड, छत्तीसगढ़ और बिहार शामिल हैं.

विद्रोही भारतीय सुरक्षाकर्मियों के विरुद्ध गुरिल्ला युद्ध कर रहे हैं. उनका दावा है कि वो अपने अधिकारों के लिए और शोषितों के अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं. संघर्ष में भूमिहीन लोग भी जिन्हें न्यूनतम मजदूरी से लेकर आधारभूत जरूरतों तक कुछ नहीं मिलता, स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा भी नहीं.

उद्योग और आदिवासियों की टक्कर

साइमन का मानना है कि यह अभियान चार दशक से भी ज्यादा समय से इसलिए चल रहा है क्योंकि भारत के गांवों में आर्थिक और सामाजिक ढांचे की प्रकृति बहुत क्रूर है. देश में औद्योगिकरण और विकास के मॉडल की लहर जो केंद्र की ओर से चली है, उससे लाखों आदिवासी विस्थापित हुए हैं.

Indien Dayamani Barla

दयामणी बार्ला

विशेषज्ञों की दलील है कि जबरदस्ती लोगों के हटाए जाने से माओवादियों को घुसपैठ जारी रखने का कारण मिल गया है. झारखंड की एक्टिविस्ट दयामणी बर्ला के मुताबिक, "आदिवासियों के हक की रक्षा में नई दिल्ली की विफलता के कारण ये लोग माओवादियों को समर्थन दे रहे हैं. क्योंकि आदिवासियों का मानना है कि माओवादी उनके मूल अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं."

हथियारबंद माओवादी गुटों ने कई बार सरकारी रैलियों और नेताओं पर हमला किया है. इनका आरोप है है कि ये लोग उद्योगों का फायदा देख रहे हैं और उनका संरक्षण कर रहे हैं. वहीं कुछ आलोचकों का कहना है कि नक्सलवादी अपने लक्ष्य से भटक गए हैं और नुकसान पहुंचाने वाले हो गए हैं क्योंकि उनके नियंत्रण में सिर्फ आदिवासी इलाका ही नहीं है बल्कि वह अमीर लोगों और व्यापारियों से भी जबरदस्ती पैसा वसूल रहे हैं. छत्तीसगढ़ और झारखंड में तीन ऊर्जा संयंत्रों के मालिक मनोज कुमार गुप्ता कहते हैं, "अगर हम उन्हें पैसे देने से मना करें तो वे हमें हड़ताल और उपकरण तोड़ने की धमकी देते हैं." अपना प्लांट और धंधा आराम से चलाने के लिए गुप्ता और उनके साथी माओवादियों को पैसे देते हैं.

सुरक्षा की चुनौती

भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नक्सलवाद को भारत की आंतरिक सुरक्षा और स्थिरता के लिए सबसे बड़ा खतरा और चुनौती बताया था. सरकार आज भी माओवादी इलाकों में छापा मारने और नेताओं को पकड़ने के लिए पुलिस बल का इस्तेमाल करती है. दक्षिण एशिया टेररिज्म पोर्टल के मुताबिक 2007 से 2012 के बीच 15,000 नक्सलवादी या तो मारे गए, या उन्हें गिरफ्तार किया गया या फिर समर्पण के लिए मजबूर किया गया.

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज हैदराबाद के राजनीतिक विश्लेषक प्रोफेसर हरगोपाल कहते हैं कि आपसी अविश्वास के कारण हिंसा और प्रतिहिंसा का कुचक्र बढ़ता जा रहा है. इस कारण इसका कोई राजनीतिक हल नहीं मिल पा रहा है.

आगे क्या

हरगोपाल इस बात पर जोर देते हैं कि हल हैं, "जोश से भरे और सक्रिय समाज को माओवादियों पर नैतिक दबाव बनाना होगा कि वह संवैधानिक नियम और कानून का पालन करें" वह कहते हैं कि दोनों धड़े विवाद और कानून के पार जा चुके हैं और हिंसा बढ़ती जा रही है.

विशेषज्ञ दलील देते हैं कि भारत का मौजूदा विकास मॉडल उद्योगों को महत्व देता है जिससे लाखों लोगों का विस्थापन हो रहा है. अगर दशकों से जारी इस अस्थिरता का कोई हल चाहिए तो विकास के इस मॉडल की फिर से समीक्षा करनी होगी और आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा भी करनी होगी.

रिपोर्टः रोमा राजपाल वाइस/एएम

संपादनः निखिल रंजन

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